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Uday Pratap

तनहाई – उदय प्रताप

दिल है तन्हा और सफर तन्हा रात तन्हा है और सहर तन्हा… जब मीलोगे तो तुमसे पुछेगे मेरे पीछे रहे कहाँ कहाँ तन्हा.. जब से तुमने ये मुहल्ला छोङा ईद तन्हा है दिवाली तन्हा… रोशनी के लिये ये सूरज भी फिर रहा है दर बदर तन्हा… अब तो सन्राटे फुसफुसाते है नही रहेगी ये खामोशी …

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पिता – उदय प्रताप

बाहर से सख्त मगर दिल का साफ होता है बाप जैसा भी हो आखिर बाप होता है बांध के रखता है उसूलो मे वो हम सब को दहलीज बेटियों की,बेटो का ताज होता है बाप जैसा भी हो आखिर बाप होता है!! ख्वाहिशे पूरी करने के लिये बच्चो की न जाने किस किस से वो …

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सच – उदय प्रताप

तेरी खुशबू को मै जब घर से लगाकर निकला।। खिङकिया सोच रही थी की आखिर कौन निकला।। सभी की आँख मे सवाल यही था की “उदय” उनकी गलियों से आज कौन अजनवी निकला।। उदय प्रताप गंगटोक, सिक्किम

गरीबी – उदय प्रताप

पूस की सर्द रात हङ्ङिया जमा देने पर आमादा सुध भी बे-सुध इसी दरम्यान घंटा घर के दोनो कांटे एक दुसरे से लिपट कर बारह बजाने पर उतारू हो रहे थे रेङ लाइट उंघ रहा था शायद.. पूस की सर्द रात किसी कयामत से कम नही होती….. फुटपाथ पर लेटा जिस्म अपनी चादर मे महफूज …

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भारती – उदय प्रताप

प्रेमिका के गाल पे जो कही कविता किसी ने तालियो के ताल पे बदन खिलखिला उठे।। चाल ढंग ऐसा यू बयान किया कामिनी की श्रोतावों के मानस के तार झनझना उठे ।। कहने पे आ गया जो मेरा यदि दिल यारो प्यार की अनोखी परिभाषा मै बताउगा प्रेयसी की बातो को मै बाजू रख कर …

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गीत-उदय प्रताप

ये वादियो की गुजारिश है हवावों की सदा ऩजर मे प्यार की चाहत लिये बुलायेगी ये वादियो की गुजारिश है….. सवाल कौन करेगा जबाब किससे मीले तमाम अनकही बाते तुम्हे सतायेगी…..- नजर मे प्यार की चाहत लिये बुलायेगी कहा मिले थे कहाॅ बिछङे कुछ खबर ही नही मेरी खामोशिया  ही वाकया सुनायेगी नजर मे प्यार …

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रमज़ान-उदय प्रताप

दिलों की दूरिया मीट जाये चलो ऐसे मीले खलिश रहे न कोई मन मे की चलो ऐसे मीले जैसे मीलती है दुआ खुद ब खुद अज़ानो से माहें रमज़ान मे ऐ दोस्त चलो ऐसे मीले   उदय प्रताप 

सीता के प्रश्र-उदय प्रताप

हे आर्य पुत्र मर्यादा मय मै पत्नी धर्म निभाउगी!! हर्षित होकर उल्लास से मै ये अग्नि पार कर जाउगी!! पर साबित  इस से क्या होगा क्या तुम मुझको समझाओगे !! जो संशय  मेरे मन मे   है उनका उत्तर दे पाओगे ? तुम भी तो   हमसे दूर रहे ना जाने कहा कहा भटके!! मै विवश तुम्हारी …

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ताजमहल – उदय प्रताप

अनगीनत ख्वाब से लबरेज है ये ताजमहल हुश्न और इश्क की तसवीर है ये ताजमहल बे जुबा पत्थरो के जिश्म चुने है इसमे कौन कहता है की जिन्दा है अभी ताजमहल नजर के तीर भी चलते है शाजिशन अब तो ढंग ऐसा की सियासत भी शरम कर बैठे जिस्म लिपटा है चाँद तारो मे दिल …

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ख़लिश – उदय प्रताप

बैठक मे रखा फूलदान कल टूट गया कई रंग के फुल थे उसमे कुछ मेरे अत्फ़ के कुछ तेरी जफ़ा के तमाम तरकीबो से उसे जोङ तो आया मगर.. दरारें आज भी दिखती है जमाने को… बैठक मे रखा फूलदान कल टूट गया… लोग कहते है समंदर बङे अर्जमन्दी से अनगीनत अफसाने खामोशी से छुपा …

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आन्तरिक – उदय प्रताप

ङायरी के पन्नो पर फिसलते हूये बेतहासा उंगलिया थम गयी अतीत के कुछ अधूरे अलफाज़ जो कभी आवाज तक पहुचे ही नही अभी तक औधें पङे थे कभी फुर्सत मे तुम भी अपने अतीत के पन्नो पर उगलिया फिराना मुझे यकीन है शायद कुछ ऐसा ही मौसम वहाँ भी हो क्योंकि इन बेजान पङे अलफाज़ो …

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भ्रष्टाचार – उदय प्रताप

फेस बुक ने फिर किया नया राग आलाप, 2 03 8 मे कहाँ रहेगे आप ? फेस बुक के दावे को इस तरह से टेस्ट किया, अपनी फोटो के बदले भ्रष्टाचार की फोटो पेस्ट किया, रिजल्ट देखकर चकराया क्योकि 2038 मे भी भ्रष्टाचार को दिल्ली मे ही पाया उदय प्रताप गंगटोक सिक्किम

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