एक प्रेम कहानी:

प्रेम कहानी: उसे याद है वो सूखा हुआ गुलाब, याद है निशा के मेहँदी वाले हाँथ, याद है वो ठहरा हुआ वक्त और आँखों ही आँखों में बातें,
याद है निशा के आँसू कैसे गालों का सफर करते हुए ठोड़ी पर आकर रुक जाते थे और बारिश की बूंदों की तरह टप टप करके टपकने लगते
और उन्ही टपकते आंसुओ में उसका कहना “तुम मुझे भूल जाओ, मैं तुम्हे भूल जाऊँगी, आज से हम दोनों अजनबी हैं, आज के बाद तुम मुझसे मिलने की कोशिश भी मत करना, अब हम अजनबी हैं अजनबी”.
सब कुछ याद है उसे लेकिन वो सबकुछ भूलना चाहता है पर कैसे?
कैसे भुलाये उसे? वो बेवफा तो नही है
उसे उसके घरवालो ने समाज की भेंट चढ़ा दिया आखिर इसमें निशा की क्या गलती?
रोहन ये सब सोच ही रहा था
तभी अचानक उसने बाइक की ब्रेक लगाई और दोनों आँखे कसकर बंद की फिर गहरी साँस छोड़ते हुए खुद से मन ही मन में बाते करने लगा क्या करूँ? क्या करूँ?
तभी अचानक पीछे से ट्रक का हार्न सुनाई दिया रोहन ने अपनी बाइक सड़क से नीचे उतारी और बिना कुछ सोचे गाड़ी मोड़ दी और निशा के घर की तरफ जाने लगा
वो गुस्से में बाइक चला रहा था उसे कुछ सूझ नही रहा था ऐसा लग रहा था की दुनियाँ का कोई वजूद ही नही
उसे सिर्फ और सिर्फ रास्ता दिखाई दे रहा था
जब वो उसके घर पहुँचा तो निशा की विदाई हो रही थी
निशा मरी मरी आवाज में रो रही थी उसके घरवाले भी गले मिल मिलकर रो रहे थे देखकर ऐसा लग रहा था की उन सबका रोना दिखावटी था ये सब देखकर
वो सोच रहा था की हीरो की तरह जाऊँ और निशा का हाँथ पकड़कर समाज के सामने उससे अपने प्यार का इजहार कर दूँ
फिर उसे समाज की नजरों के सामने अपनी बाइक पर बिठाकर दूर ले जाऊँ
दूर बहुत दूर जहाँ समाज के नियम कानून न हो जहाँ उन्हें मुजरिमो की नजर से न देखे कोई
पर ये फिल्मो में होता है असलियत में नही कर सकता या मुझमे ये सब करने की हिम्मत नही है
उसने गौर किया की निशा की सहेली जो दिखावटी तौर पर धीरे धीरे रो रही थीं उन्होंने रोना बंद कर दिया और उसकी तरफ देखकर आपस में कुछ बतियाने लगी
देखते ही देखते उसकी एक सहेली निशा के पास गयी और उसके कान में कुछ कहा
निशा ने झट से रोहन को तरफ देखा और जोर जोर से रोने लगी
निशा के भाई और पिता ने भी रोहन को देख लिया उन दोनों की आँखों में आग की लपटें उठने लगीं थी
वो टकाटक निशा को देखे जा रहा था और निशा उसे
निशा अब जोर जोर से रो रही थी उसे अपने पल्लू की फ़िक्र नही थी जो नीचे गिर चुका था जिसे उसकी माँ ने सही किया
लेकिन वो बेकाबू होकर रो रही थी उसे देखकर रोहन की आँखे भी नम थी लेकिन वो लाचार था और कर भी क्या सकता था?
फूलो से सजी कार तैयार खड़ी थी विदाई के लिए
इतने में निशा को पता नही क्या हुआ वो दौड़ती हुई आई और सीधे रोहन के गले लग गयी

सब चौक गए वो गले मिलकर बहुत जोरो से रो रही थी
रोहन ने भी उसे अपनी बाँहो में समेट लिया
अब उसे न तो समाज का डर था न निशा के भाई का न उसके पिता का
वो पल मानो रुक सा गया
निशा के आँसुओ ने रोहन की कमीज भिगो दी थी और रोहन की आँखों में जो नमी थी वो जज्बात बनकर बहने लगी
तभी किसी ने निशा का हाँथ खीचा पर वो रोहन से दूर नही होना चाहती थी
रोहन ने देखा तो निशा का भाई उसे खीच रहा था और वो रोहन से दूर नही होना चाहती थी और रोहन उससे
पता नही था दोनों को के उन्हें ये दिन भी देखना पड़ेगा
क्या यही होता है मोहब्बत का अंजाम?
जब दोनों ने समाज से डरते डरते प्रेम किया था
वो हमेशा दूर ही रहे उन्हें इसी बात की चिंता थी के समाज क्या कहेगा ?
रोहन जब सुबह दुकान पर जाता था तो कभी भी निशा को फोन नही करता घर आता तो भी कभी फोन नही करता
उन्होंने बात करने का एक समय बना लिया था जब रोहन सुबह सुबह दौड़ने जाता था और निशा कोचिंग
खैर प्यार कब तक छुपा रह सकता है एक न एक दिन सामने तो आयेगा ही और इस गुफ्तगू की भनक निशा की सहेलियों को भी लग गयी बात बढ़ते बढ़ते निशा के घर तक चली गयी
जिस वजह से उसके घरवालो ने उसकी कोचिंग बंद करवा दी अब कई दिनों तक वो एक दुसरे को देखे बिना रहे
इस दौरान रोहन रोज दौड़ने जाता था इस इन्तजार में के निशा आएगी वो कभी जल्दी उठकर जाता कभी देरी से पर निशा नही आती थी
एक दिन उसकी मुलाकात निशा की सहेली से हुई तो उसने पुछा निशा क्यों नही आती पढ़ने के लिए?
निशा की सहेली ने बताया की उसकी शादी होने वाली है तुम्हे नही पता क्या?
ये सुनकर रोहन के पैरो तले जमीन खिसक गयी उसने आगे कुछ नही पुछा और वहीँ बैठ गया
उसी दिन से रोहन ने दौड़ना बंद कर दिया उसका मन न काम में लगता न दुकान पर न घर पर
न ही दौड़ में
कहीं भी मन नही लगता कभी वो टीवी चलता कभी कम्प्यूटर
पर न जाने उसे क्या हो गया था?
किसी भी काम में मन नही लगता
एक दिन हुआ ये की उसकी सहेली शादी का कार्ड देने आई
निशा की शादी का
रोहन ने चुपचाप कार्ड लेकर रख लिया उस कार्ड में मानो काँटे हो जो रोहन को चुभ रहे थे
जब उसने वो कार्ड खोला तो उसमे लिखा एक एक शब्द उसे झकझोर रहा था और अंदर ही अंदर उसे जलन भी हो रही थी तरस भी आ रहा था गालियाँ भी जहन में आ रही थी
एक साथ कई फीलिंग्स उसे घेर रही थी
उसकी शादी से तीन दिन पहले रोहन ने निशा को देखा जब वो सहेलियों के साथ व्यूटीपार्लर से निकल रही थी उसने रोहन को देख लिया मगर मुँह घुमाकर जाने लगी
इतने में उसकी सहेली रोहन के पास आई और कहा सामने वाले रेस्टोरेंट में आओ अभी
रोहन पहुच गया अब दोनों आमने सामने थे लेकिन बात नही कर रहे थे
ये बात उसकी सहेलियां समझ गयी की ये पब्लिक प्लेस है
रोहन के मन में बहुत सवाल थे वो सब पूछना चाहता था इसीलिए उसने सिर्फ ये कहा गार्डन में मिल सकती हो तुमसे कुछ बात करनी थी
उसने कहा नहीं
जब वो जाने लगी तो उसकी एक सहेली बापिस आकर बोली कल 2 बजे पहुच जाना उस समय बगीचे में कोई नही आता
वो सोचता रहा उसे आखरी बार मिलने पर क्या गिफ्ट दूँ पहली बार तो गुलाब दिया था
चलो इस बार भी गुलाब ही दूँगा पर सूखा हुआ गुलाब
उसने एक गुलाब का फूल टहनी सहित धुप में सूखने के लिए डाल दिया
अगले दिन वो 12 बजे ही पहुच गया और निशा की सहेलियां भी उसे लेकर 2 बजे पहुची कोई बात शुरू होती इससे पहले ही निशा की सहेलियां बोली तुम लोग बाते करो हम सब घूम के आते हैं
सबसे पहला सवाल रोहन ने यही पुछा आखिर क्यों ? ये सब क्या हो रहा है?
अचानक से तुम्हारा कोचिंग जाना बंद क्यों हुआ
और शादी इतनी जल्दी क्यों
क्या तुमने मुझसे प्यार नही किया?
निशा ने बताया की वो प्यार तो अभी भी करती है पर ज़माने से मजबूर है घरवालो से मजबूर है
लोग प्यार करने वालो को बदचलन कहते हैं
मेरी शादी मेरी मर्जी के खिलाफ हो रही है अभी मेरी पढ़ने की उम्र है मुझे बहुत कुछ करना है
रोहन ने कहा तो मना कर दो शादी करने से
उसने बताया बहुत मना किया लेकिन घरवाले नही माने अभी मेरे पीछे 4 बहने और है इसीलिए मेरी शादी जबरदस्ती कर रहे है की अगर तू नही करेगी शादी तो कल छोटी वाली शादी लायक हो जायेगी फिर उससे छोटी एक साथ इतना पैसा कहाँ से आएगा
मैंने अभी दूल्हे को नही देखा सुना है उसकी सरकारी नौकरी है 40 हजार मिलते हैं उसे
रोहन ने कहा तुम्हे पैसो से मोहब्बत है सही कहा न
उसने बताया तुम्हे कैसे समझाऊँ मैं मजबूर हूँ
और हाँ मेरी शादी में तुम न आना  मेरी जान की कसम खाओ
रोहन ने सूखा गुलाब देते हुए कहा नहीं आऊंगा
वो सूखा गुलाब लेकर निशा बहुत गौर से देखती रही के अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गए
वो समझ गयी रोहन क्या कहना चाहता है
उसने सूखे गुलाब को मेहँदी वाले हांथो से मसल कर चूर चूर कर दिया
और कहा आज से हम अजनबी हैं तुम मुझे भूल जाओ तो बेहतर है मैं भी तुम्हे भुला दूंगी
न तुम मुझे जानते हो न मैं तुम्हे अब हम कभी नही मिलेगे
तभी उसकी सहेलियां आई और कहने लगी बात हो गयी हो तो चलो घरवालो को शक हो जायेगा व्यूटीपार्लर का बहाना कर के आये थे और व्यूटीपार्लर भी नही गए चलो जल्दी
जब वो जाने लगी तब रोहन ने जमीन पर पड़े सूखे गुलाब के टुकड़े उठाकर कहा मैडम जी
तभी निशा और उसकी सभी सहेलियों ने एकदम पलट कर देखा
तो रोहन ने कहा मैं आपको नही जानता
इतना सुनते ही वो आँसू पोछते हुए चली गयी
ये सब पुरानी बाते सोच ही रहा था के
तभी उसे महसूस हुआ किसी ने निशा का हाँथ खीचा
पर वो रोहन से दूर नही होना चाहती थी
रोहन ने देखा तो निशा का भाई उसे खीच रहा था और वो रोहन से दूर नही होना चाहती थी और रोहन उससे
पता नही था दोनों को उन्हें ये दिन भी देखना पड़ेगा
क्या यही होता है मोहब्बत का अंजाम?
उसने हालात संभाले और निशा को खुद से अलग किया और खुद दूर जाकर खड़ा हो गया
पर निशा का ध्यान उसकी तरफ से हट नही रहा था उसके भाई और पिता ऐसे देख रहे थे जैसे वो रोहन को जिन्दा ही खा जायेगे
तभी एक शख्स ने निशा का हाथ पकड़ा शायद उसके मामा होंगे जीजा तो नही हो सकते क्योंकि उसकी कोई बड़ी बहन नही थी
वो लंगड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे और निशा उनके कंट्रोल से बाहर थी वो पैर आगे नही बड़ा रही थी हालात को सम्भालते हुए रोहन ने निशा को गोद में उठाया और फूलो सजी कार की तरफ चलने लगा
ये देखकर उसके पिता और भाई की आँखे भी नम हो गयी थी कभी आग उगलती थीं
कार का दरवाजा खुला उसने निशा को बिठाया और पीछे मुड़कर नही देखा
बाइक स्टार्ट की और दुकान पर चला गया
वहां जाकर अपने हाथो की तरफ देखकर सोचने लगा
इन्ही हाथो से मैंने मोहब्बत का गाला घोटा
आज ये हाथ गुनेहगार बन गए
जब अपनी ही मोहब्बत को अपने ही हाथो में उठाकर किसी दूसरे की बाहों में दे दिया
तभी उसने गौर किया कार में शायद दूल्हा तो था नही
एक अधेड़ बैठा था 40 साल का जिसके हाथो में मेहदी लगी और कलाई पर रूमाल बँधा हुआ था
कहीं……………………...
फर्रुखाबाद यूपी
8004352296
सूखा गुलाब (एक प्रेम कहानी) लेखक: राहुल रेड
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