गौरी अपनी ही उधेड़बुन में थी कि एक उलझन और उसके सामने आ गई| महाविद्यालय में पोजीशन आने के बाद वह अपनी पढ़ाई जारी रखे या नौकरी करे, इस प्रश्न से जूझ ही रही थी कि घर वालों द्वारा उसकी शादी तय करने का फैसला उस पर बिज़ली सा आन गिर पड़ा| वह अभी मानसिक रूप से शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी पर घर वालों की जिद्द उसकी ज़िन्दगी में फैसला बन चस्पा हो गई| वह चाह कर भी उनका प्रतिकार न कर सकी| उसकी इच्छाए उनके फैसले की चट्टान से टकरा टकरा कर चूर चूर हो गई अंततः उसकी स्वीकृति के बिना भी देखने दिखाने की रस्म कर दी गई| अब आगे की रस्मों में जिसमें उसकी मौजूदगी अनिवार्य थी, उसके लिए उसे चेताया गया| उसके कमज़ोर पड़ते हौसले में माता पिता की आर्थिक कमज़ोर स्थिति और उसके बाद की तीन और बहनों की ज़िम्मेदारी के होम ने उसे शादी के पथ से विलग नहीं होने दिया| अब उसने अपने विषय में कुछ सोचना ही छोड़ दिया और उनके द्वारा तय की लकीर पर चलना शुरू कर दिया था| लेकिन एक नई उलझन अपने भावी जीवन को लेकर उसके सामने थी| शरीर से परिपक्व गौरी अपने संशित मन को नव जीवन की प्रत्येक परिस्थितियों के लिए तैयार करने लगी| आखिर वो दिन भी आ गया जब शादी, विदाई के क्रम में एक अजनबी शख्स उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया| कई सदस्यों से भरे परिवार का एक और सदस्य बन वो भी जुड़ गई| नई जगह नए लोग उसके मन में अनगिनत उपापोह मचाए थे| पहली रात से ही अपने पति के शांत स्वभाव से वो परिचित हो गई| वे उसकी दस बातों पर मुश्किल से एक हाँ – हूँ से ही जवाब देते थे| वहां सबका अपना अपना ढंग और अपना अपना स्वभाव था| उसी में खुद को ढालते ढालते दो माह कब व्यतीत हो गए उसे पता भी न चला| ये नई ज़िन्दगी उसके जीवन में और कितने प्रश्न लाएगी ये वो न जान पाई कि इसी बीच गौरी का पति अकस्मात् बीमार हो गया| अब पति की सेवा टहल में उसका वक़्त बीतने लगा| एक पल को भी वो उनके पास से न हटती| उसके बीमार पति की परिवार में अनदेखी और प्राइवेट नौकरी से निकाले जाने की असह्य पीड़ा से गौरी भी गुजरने लगी कि अकस्मात् उसके जीवन में एक ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ और उसका पारिवारिक जीवन छिन्न भिन्न हो गया| वो चित्कार भी न सकी और उसके जीवन में एक अनचाहा बदलाव आ गया| उसके बीमार पति चन्द दिनों में ही अस्पताल से शमशान की मिट्टी तक पहुँच गए और वक़्त के इस बेरहम फैसले के सामने भी वो हतप्रभ खड़ी रह गई| इस अकस्मात् की शून्यता ने गौरी के अंतरस को हिला कर रख दिया लेकिन इस दो माह के आगामी पंद्रह दिन उसके लिए और भी दुश्वार गुजरेंगे उसे आभास ही नहीं था| इन आगामी दिनों ने उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर जैसे कालिख सी पोत दी| उसका पति बीमार हुआ और फिर मृत्यु की शैय्या पर जाकर खो गए पर उसके पश्चात गौरी अपने अधूरे अस्तित्व के साथ खुद को मृतप्राय समझने लगी थी कि एक ख़बर से उसके पैरो तले की बची ज़मीन ही सरक गई| जब उसे ये पता चला कि उसका पति की मृत्यु एड्स से हुई है | ये सुनते उसकी ज़िन्दगी में अनचाहा एक भूचाल सा आ गया|
पहले वह सिर्फ विधवा थी एक बेचारी विधवा पर एकाएक वह सबकी नज़रों में राक्षसी, डायन हो गई| सभी मान बैठे कि गौरी को पहले एड्स था और उसी से उसके पति को हुआ| गौरी ने ही अपने पति के जीवन को निगल लिया| ये कोई पारिवारिक समस्या होती तो गौरी सहते रोती-बिलखती कम से कम इस घर के एक कोने में तो पड़ी रहती| अब गौरी का पारिवारिक ही नहीं सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया| वह न अश्क रोक सकी न खुल कर बहा सकी, किसी को उससे हमदर्दी नहीं थी| वह खून का घूंट पी कर रह गई| कैसे यकीन दिलाए? क्या कहे? कोई शब्द ,कोई सबूत नहीं था उसके पास अपने को पाक साफ़ साबित करने का| वह मूक तमाशबीन की तरह अपने सामने अपनी दुनिया मिटती देखती रही आखिर उसे उस घर से निकाल दिया गया उस घर से जिसको उसने अपना सब कुछ छोड़कर अपनाना शुरू ही किया था| एक वृहत् परिवर्तन उसके जीवन में आ गया| एक स्त्री जिसे ससुराल में जगह न मिले तो उसकी आखिरी एक मात्र उम्मीद उसका पीहर होती है| गौरी समस्त उदासी समेटे अपने पीहर वापस आ गई| उसका वापस आना यदि जाने के लिए होता तो शायद किसी को कुछ खलिश न होती पर ये अंततः वापसी थी| फिर कभी वापस उस घर में न जाने जहाँ तिरस्कृत व अपमानित कर वह निकाली गई थी| गौरी की आखिरी उम्मीद उसका पीहर का परिवार ही था, उसे विश्वास था की दुनिया में कोई उसे कुछ भी समझे पर कम से कम उसके माता पिता तो उसकी मनः स्थिति को समझेंगे| तभी जीवन का एक अटल सत्य उसके आगे प्रस्फुटित हो उठा, अगर वे सिर्फ उसी के माता पिता होते तो शायद वे गौरी को स्वीकार कर लेते परन्तु उनके आगे तीन और बेटियां थी जिनका उन्हें बिरादरी में विवाह करने के लिए गौरी को स्वीकृत करना उनके लिए मुश्किल हो गया| ये गौरी का कठिनतम वक़्त था| घर का अनादरित टीन का शेड अब गौरी का आसरा बना| वह एक एक दिन अपने परिवार का तिरस्कार कड़वे घूंट की तरह गले से उतार रही थी| उसकी वह बहने जिनका दीदी दीदी कहते गला न सूखता था अब वे उससे कतरा कर निकल जाती| उसकी माँ उसे दूर से ही खाना दे कर अपनी ममता का भार उतारती मौन वापस चली जाती| उनका मन गौरी को बहुत कुछ कह जाता उस हर पल के तिरस्कार से उसकी मर्माहत चित्कार उठती| जिस आसरे उसने शरण पानी चाही वही उसकी सारी उम्मीदें ढहती नज़र आई| ये पल गौरी के लिए पहले से भी ज्यादा असहनीय गुज़र रहे थे| हर पल घुटती अपने में ही मरती रही वह| ये पल उसके जीवन का दुखद व किसी त्रासदी की तरह थे| ये मृत्यु से पूर्व मृत्यु थी| हर दिन उसकी आत्मा टुकड़ों टुकड़ों में मर रही थी| आत्म स्वावलंबी गौरी के लिए ये नागवारा था| वो सबका तिरस्कार सह सकती थी पर अपनी जन्मदात्री का तिरस्कार उसके लिए असहनीय था| आखिर उसने मन ही मन तय कर लिया कि सारी दुनिया उसका साथ भ्लेहि न दे पर वह अपना साथ कतई नहीं छोड़ेगी| ऐसे जीवन से तो मृत्यु भली पर उसकी मृत्यु से समस्या हल न होती बल्कि उसके चरित्र पर लगा दाग कभी साफ़ न हो पाता| उसे घुट घुट कर मरने से संघर्ष करते हुए मरना ज्यादा रास आया| उसे पता था ये ऐसी लड़ाई थी जिसके रास्तें नाउम्मीदी से लबरेज़ थे फिर भी गौरी हौसला कर उठी और बाहर समाज में निकली| अब उसे अपने जीवन यापन के लिए एक अदद नौकरी और सर छुपाने को एक आसरे की आवश्कता थी| दर दर भटकते आखिर किसी तरह गौरी को एक पुनर्वास संस्था में नौकरी और रहने की एक जगह मिल गई| उसने जब घर छोड़ा तो पलट कर उनकी तरफ न देखा न उन्होंने ही उसे खोजा| सब कुछ भूल कर गौरी मन लगा कर काम करने लगी| धीरे धीरे सब उसकी लगन व कर्मठता का लोहा मानने लगे| इसी बीच शारीरिक असमर्थता भी उसके आड़े आने लगी| तब उसने अपने स्वास्थ की जाँच कराई तो पता चला की वह भी अब एच आई वी पॉजिटिव है लेकिन ये सुनकर भी उसने हिम्मत नहीं हारी| दवा, दुआ और साहस के सहारे फिर से वह अपने संघर्ष पथ पर अग्रसर हो गई| इश्क और मुश्त छुपाए नहीं छुपता आखिर संस्था के लोगो को उसकी बीमारी का पता चल गया| पुनर्वास संस्था जहाँ बेसहाराओ को सहारा मिलता है उन्होंने गौरी को एक बार फिर से बेसहारा कर दिया|
अब न कोई उसके साथ बैठता न खाता और न ही बात करता था| गौरी इस बार इस विष पान के लिए पहले से ही तैयार थी| लेकिन इस बार उसने पाया कि वह अकेली नहीं है कोई था जो उसके दबते हौसले की आंच को हवा दे रहा था| वह गौरी का सहकर्मी था और उस संस्था में एक उच्च पद पर कार्यरत था उसने गौरी को वहां से निकालने से मना कर दिया| द्वेष और घृणा के झुण्ड में एक मित्र को पाकर गौरी में जैसे एक नई चेतना आ गई| अब उसका संघर्ष एक जनमानस का संघर्ष का रूप ले रहा था| इसलिए उसका प्रयास अपने को सिद्ध करने से ज्यादा अब एड्स के प्रति लोगों की भ्रांतियों से लड़ना था| गौरी ने अपने सहकर्मी सुरेश के साथ इस विषय पर कई सूचनाएं एकत्र की और सबसे पहले उस संस्था के लोगो को जागरूक किया| उनको बताया कि ये कोई छूत की बीमारी नहीं है इसलिये न साथ खाना खाने या किसी को छूने से ये बीमारी नही फैलती है| ये तो संसर्ग व खून के माध्यम से एक शरीर से दूसरे शरीर में फैलती है और इससे शरीर में उपस्थित प्रतिरोधक क्षमता का क्षय होने लगता है जिससे अमूक व्यक्ति जल्दी जल्दी किसी न किसी रोग से ग्रसित होने लगता है| तब अपनी प्रतिरोधक क्षमता को सुद्रढ़ करने के लिए डॉक्टरी सलाह व दवाई ही उस व्यक्ति के लिए काफ़ी नहीं बल्कि सामाजिक पारिवारिक साथ भी उसका अपने जीवन के प्रति प्रेम आस्था बनाए रखता है| ऐसी ही कई सूचनाएं दोनों ने मिल कर संस्था के लोगों तक पहुंचाई फिर भी कुछ लोगों ने उनका विश्वास नहीं किया वे अपनी रूढ़िवादिता पर टिके रहना अपने समाजवाद की शान समझते थे तब अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए सुरेश और गौरी ने इस क्षेत्र में अपना योगदान देते डॉक्टरों और समाज सेवको की भी मदद ली| अब उनके मुंह से भी वही सब सुन कर उन्हें अपने कृत्य पर शर्म आई| इस तरह गौरी ने अब ये मुहीम सिर्फ इस संस्था तक ही सीमित नहीं रखी बल्कि इसे आगे तक बढ़ाया और इस अंतहीन संघर्ष में अपने जीवन काल के एक एक पल को उसने समाजसेवा के प्रति समर्पित कर दिया| 
Archana Thakurअर्चना ठाकुर, कानपुर
जन्म : 05 मार्च
जन्म स्थान : कानपुर(उत्तर प्रदेश) शिक्षा : मनोविज्ञान, हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, परामर्श में डिप्लोमा, एम0 फिल (मनोविज्ञान) प्रकाशन : विभिन्न मुद्रित एवम अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथा, निबंध,यात्रा व्यतांत आदि का प्रकाशन प्रकाशन : प्रथम पुस्तक (कहानी संग्रह – लेखक की आत्मा)
ये अंत नहीं है
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