भूपेंद्र सिंह 20 Dec 2023 कहानियाँ अन्य 10753 0 Hindi :: हिंदी
उपन्यास विजय बहादुर की जीवन गाथा भाग -3 कबीले में डाकू और अरहान का कहर उस लड़की ने एक और नज़र दौड़ाई और सिहर सी उठी। कुछ आदमी घोड़े पर बैठे हुए थे और तेजी से कबीले की और बढ़ रहे थे। विजय ने भी उस और देखा। वे लोग देखने में कोई डाकू लग रहे थे। विजय ने लड़की की और देखते हुए पूछा "ये लोग कौन है?" लड़की ने कुछ जवाब नहीं दिया और विजय का हाथ पकड़ते हुए उसे एक झोपड़ी के पीछे ले गई। वे दोनो वही छिप गए। फिर वो लड़की धीरे से बुधबुदाई ताकि उसकी आवाज को सिर्फ विजय ही सुन सके "ये लोग डाकू है ये हर महीने के पहले दिन गांव वालो से कर लेने आते है और कर न देने पर उनकी मारपीट करते है।" "तुम लोग इनसे लड़ नही सकते।"विजय ने उस लड़की की और घूरते हुए पूछा। विजय की बात सुनकर वह लड़की खामोश ने गई और फिर धीरे से बोली ताकि उसकी आवाज को सिर्फ और सिर्फ विजय ही सुन सके " ये लुटेरे लोग बहुत खतरनाक है, इनके पास तलवारें है और हमारे पास कुछ भी नही । हम तो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते।" वे दोनो बातें कर ही रहे थे की तभी वे डाकू उस कबीले के अंदर आ घुसे। पूरे चार डाकू थे। वे अपने घोड़ों से नीचे उतरे। विजय और वो लड़की छिपकर उन डाकुओं को और देखने लगे। उनमें से एक ताजा और मोटा सा डाकू तलवार की धार पर अपना अंगूठा फेरते हुए बोल पड़ा "सारे गांव वालो कान खोलकर सुनो, तुम्हारे पास जो कुछ भी है चुपचाप हमारे कदमों के पास लाकर रख दो। वरना तुम सब मेरे हाथों से मारे जाओगे ।" विजय ने अनुमान लगाया शायद वो इन डाकुओं का सरदार होगा। इतने में कबीले के लोग बाहर आए और कुछ न कुछ उन लुटेरों के पास जाकर रखने लगे। कोई मोहरें रखता, कोई आटा रख देता, कोई धान रख रहा था। विजय ने डाकुओं से थोड़ी दूरी पर नजर दौड़ाई। उस और एक बूढ़ा व्यक्ति गुमसुम सा खड़ा था। तभी वो मोटा और ताजा सा डाकू धीरे धीरे उस बूढ़े व्यक्ति की और बढ़ने लगा और उसके पास जाकर खड़ा हो गया। वो बूढ़ा व्यक्ति उस डाकू को देखकर थर थर कांपने लगा। वो डाकू अपनी तलवार पर हाथ फेरते हुए उस बूढ़े की और गुस्से से देखते हुए बोला " क्यों रे बूढ़े तूं कुछ भी नही देगा कया?" ये सुनकर वो बूढ़ा व्यक्ति डरने लगा और अपना कंपकंपाता हुआ हाथ आगे किया। उसके हाथ पर चार मोहरे थी। उस डाकू ने उन मोहरों को उठाया और फिर एक मोहर को गौर से देखते हुए हंसने लगा और फिर अजीब सी हंसी में हंसते हुए बोल पड़ा " बस चार मोहरे बूढ़े, इतने से काम नहीं बनेगा। साले तो मुझे, मंगल डाकू को सिर्फ चार मोहरे दे रहा है।" मंगल डाकू गुस्से से उस बूढ़े की और देखते हुए बोला। वो बूढ़ा कांपने लगा और मंगल डाकू के पावों पर जा गिरा " मेरे पास जो कुछ भी था वो सब कुछ मैंने तुम्हे दे दिया है मंगल डाकू।" विजय बहादुर और वो लड़की ये सारा नजारा उस झोंपड़ी के पीछे से छिप छिपकर देख रहे थे। इतने में मंगल डाकू ने अपने एक साथी की और कुछ इशारा किया और फिर बूढ़े की और देखकर मुस्कुरा पड़ा। उसके साथी ने घोड़े की पीठ पर बंधे हुए थैले से एक बेंत निकाली। उस डाकू को बेंत निकलता देख सारे कबीले के लोग डर गए। कबीले का सरदार भी चुपचाप खड़ा ये नजारा देख रहा था। वो बेचारा चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था। वो मंगल डाकू कबीले के लोगों की और दो कदम आगे बडकर अपने दोनो हाथो को फैलाकर बोला " अगर किसी ने भी हमे कर नही दिया या फिर कम कर देने की कोशिश की तो फिर उसका भी यही हाल होगा जो तुम्हारी आंखों के सामने अभी इस बूढ़े का होगा।" ये कहकर वो डाकू बूढ़े की और देखने लगा। एक डाकू बेंत लेकर बूढ़े के पास चला गया और बेंत को लंबी किया। कबीले के सारे लोग उस बूढ़े की और आंखे फाड़ फाड़कर देखने लग गए। वो बूढ़ा जमीन पर बैठकर अपनी जान की भीख मांग रहा था। ये सारा नजारा देखकर विजय का दिल पिघल गया और उसे उस बूढ़े पर तरस आने लगा। विजय ने अपनी तलवार पर हाथ रखा और उसे बाहर निकलने लगा ही था की तभी उस लड़की ने विजय का हाथ पकड़ लिया और बोली " ये डाकू बहुत खतरनाक, तुम अकेले इनका मुकाबला नही कर पाओगे। हमे इन डाकुओं के चले जाने का इंतजार करना चाहिए ।" इतने में उस डाकू ने एक जोरदार बेंत उस बूढ़े की पीठ पर दे मारी। वो बूढ़ा दर्द से कराह उठा और जमीन पर लोटपोट होने लगा। कबीले के लोग बस चुपचाप मूर्तियां बनकर खड़े थे और इस भयानक मंजर को देख रहे थे। विजय ने अब गुस्से से उस लड़की की और देखा और बोल पड़ा "इन डाकुओं ने तुम्हारे दिल में डर पैदा कर दिया है । तुम सिर्फ इनके गुलाम बनकर रह गए हो। ये डाकू तुम्हे उतना ही डराएंगे जितना की तुम इनसे डरोगे। तुम एक बार इनके सामने तलवार उठाकर देखो ये डाकू क्या सारी दुनिया ही तुम्हारे सामने सर झुका देगी।" विजय की ये बात सुनकर वो लड़की खामोश हो गई और अपना सिर नीचे झुका लिया। वो लड़की भी ये बात अच्छे तरीके से जानती थी कि विजय जो कुछ कह रहा है वो सब सच है कोई झूठ नही। इतने में वो मंगल डाकू अपने साथी डाकू के पास गया और उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा झड़ दिया और उसकी और शकभरी निगाहों से देखते हुए बोला "तुम्हे बेंत भी नही मारनी आती । मुझे दो मैं तुम्हे बताता हूं की बेंत कैसे मारी जाती है और किस तरह एक इंसान फिर चीखता है।" ये कहते हुए मंगल डाकू ने वो बेंत अपने हाथों में पकड़ ली। ये भयानक नजारा देखकर सारे लोग डर गए पर कोई कुछ भी नही बोला। अब मंगल डाकू उस बूढ़े के चारों ओर चक्कर काटने लग गया और फिर उस बेंत को पीछे की और किया और फिर अपना पूरा जोर लगाते हुए वो बेंत बूढ़े को मारने के लिए अपने हाथ को आगे की और करने लगा। कबीले के लोगों ने अपनी आंखें बंद कर ली। पर मंगल डाकू का हाथ आगे नही बढ़ सका शायद वो बेंत किसी ने पकड़ ली थी। उसने फिर अपनी पूरी ताकत लगाई पर बेंत वही रुकी रही। कबीले के लोगों ने धीरे धीरे अपनी आंखें खोली और उनमें एक उम्मीद की किरण जग गई। वो लड़की भी ये सब कुछ देखकर झोंपड़ी के पीछे से बाहर निकल आई और कबीले के सरदार के पास जाकर उस बेंत की तरफ उंगली करते हुए जोर से बोली "यही है हमारा मसीहा ।" ये सुनते ही मंगल डाकू चौंक गया और धीरे धीरे अपनी नजर पीछे की और दौड़ाई। तो उसने देखा बेंत को पकड़े हुए कोई नौजवान लड़का खड़ा था । लंबा कद, गौरा रंग, सुडोल शरीर। उसे देखकर तो मंगल डाकू भी थोड़ा सा डर गया। उस बूढ़े ने भी विजय बहादूर की और उम्मीद से देखा । वो मंगल डाकू उसकी और आश्चर्य से देख ही रहा था की तभी विजय ने एक जोरदार लात मंगल डाकू के पेट पर दे मारी। मंगल डाकू उड़ता हुआ एक झोंपड़े से जा टकराया और ढेर होकर रह गया । बाकी तीनों डाकू भी उसकी बहादुरी को देखकर दंग रह गए। विजय ने अपनी तलवार निकाल ली। उसने उन तीनो डाकुओं की और देखते हुए कहा "अगर तुमने अपनी मां का दूध पिया है तो फिर मुझसे लोहा लो। कबीले के इन मासूम लोगो पर क्या बहादुरी दिखा रहे हो।" ये सुनते ही उन तीनो डाकुओं ने भी अपनी तलवारे निकाल ली। फिर कुछ देर बाद एक भयंकर और रक्तरंजित जंग छिड़ गई। कबीले के सारे लोग बस आंखें फाड़ फाड़कर विजय बहादुर की बहादुरी को देखे जा रहे थे । विजय उन तीनो डाकुओं से लोहा ले ही रहा था की तभी वो मंगल डाकू भी लड़खड़ाते हुए उठ खड़ा हुए। विजय की एक लात ने ही उसे दिन में तारे दिखा दिए थे । पर उसने खुद को संभाला और वो भी विजय पर टूट पड़ा। कभी लगता की विजय जीत रहा है तो कभी लगता की वे डाकू जीत रहे है। कुछ लोग तो डर के मारे अपनी झोंपड़ियों में घुस गए। इतने में वो विजय उन डाकुओं को उठा उठाकर मारने लगा। एक के बाद एक चारों डाकू एक झोंपड़े से जा टकराए और फिर वही पर ढेर होकर रह गए। कबीले के सारे लोग विजय की बहादुरी को देखकर तालियां बजाने लगे। इतने में मंगल डाकू ने विजय को जोरदार धक्का दे मारा और जोर से चिला पड़ा "जल्दी भागो, इससे पहले की यह फिर उठ खड़ा हो। अपनी जान बचाकर भागो।" ये कहते हुए वे चारो डाकू अपने घोड़ों पर बैठकर तेजी से भागने लगे। विजय बहादुर भी उठ खड़ा हुआ और उनके पीछे भागा। "अरे रुको , हिम्मत है तो मुझसे लड़ो।" लेकिन तब तक वे डाकू वहा से नौ दो ग्यारह हो गए। विजय भी हांफते हुए कबीले के लोगों के पास वापिस आ गया। इतने में उस लड़की ने विजय बहादुर की बहादुरी की सारी कहानी कबीले के उस सरदार को कह डाली। कबीले के सरदार ने विजय के कंधो पर अपने हाथ रखते हुए कहा "बेटा तुमने हम पर बहुत बड़ा उपकार किया है । पहले तुमने हमारी बच्ची को भेडिये के आतंक से बचाया और फिर अब हमें इन डाकुओं के कहर से बचाया। हम तुमसे बहुत खुश है। हम तो तुम्हे मुंह मांगा इनाम देने के लिए तैयार है। बताओ तुम्हे क्या चाहिए?" विजय ने कबीले के सरदार की और देखा और फिर कुछ निराश होकर बोला "दरअसल मेरे दोस्त मनोज को आदमखोर उठाकर ले गए है। मैं उसे ही ढूंढ रहा हूं। आप मेरी मदद कीजिए।" आदमखोरों का नाम सुनते ही कबीले का सरदार थोड़ा सा निराश हो गया और फिर सूरज की किरणों की और देखते हुए बोला "बेटा वो लोग तुम्हारे दोस्त को कब उठाकर लेकर गए थे ?" "लगभग आधी रात को जब मैं गुफा से बाहर निकला था।" विजय ने जवाब दिया। वो कबीले का सरदार फिर से बोल पड़ा "तुम्हारे पास अब भी वक्त है। तुम्हारा दोस्त अब भी जिंदा होगा। यहां तक मुझे मालूम है वो आदमखोर इंसान को एक दिन तक बांधकर रखते है उनका मानना है कि ऐसा करने से इंसान का मांस और अधिक स्वादिष्ट हो जाता है। कल सुबह सूरज की पहली किरण निकलते ही वो लोग तुम्हारे दोस्त को मारकर खा जायेंगे। इस लिए तुम्हारे पास सिर्फ आज रात का ही वक्त होगा।" "आप मुझे बताइए वो आदमखोर मुझे कहा पर मिलेंगे?" विजय ने कुछ हड़बड़ाहट में उस कबीले के सरदार की और देखते हुए पूछा। "वो आदमखोर उतरी दिशा के काले जंगलों में रहते हैं पर.......।" इतना कहकर वो खामोश सा हो गया। "पर क्या" विजय बहादुर ने उससे पूछा। "बेटा उन आदमखोरों से लड़ पाना असम्भव है । वे बहुत खतरनाक है। वे लोग तो तुम्हे देखते ही मार डालेंगे। तुम अब अपने दोस्त को भूल जाओ, यही अच्छा होगा।" "नहीं मैं अपने दोस्त को बचाकर ही रहूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए, मैं उन आदमखोरों के टुकड़े टुकड़े कर डालूंगा।" विजय ने गुस्से में कहा। "फिर तो बेटा सिर्फ एक ही रास्ता है। उन आदमखोरों को सिर्फ आदमखोरी तलवार से ही मारा जा सकता है। तुम वो आदमखोरी तलवार ले आयो।" कबीले के सरदार ने कहा। ये सुनकर विजय थोड़ा सा उत्सुक हो उठा। उसके हृदय में उम्मीद की एक किरण जगी। उसने जल्दी से कबीले के सरदार से पूछा "लेकिन मुझे वो आदमखोरी तलवार मिलेगी कहां?" विजय का ये सवाल सुनकर कबीले का सरदार थोड़ा सा निराश हो गया और फिर बोला "वो तलवार कहां है। ये तो सिर्फ वही जानता है।" इतना बोलते ही वो कबीले का सरदार थोड़ा सा घवरा गया। कबीले के बाकी लोग भी थोड़ा सा डर गए। विजय ने शकभरी निगाहों से सबकी और देखते हुए कहा "कौन जनता है उस तलवार का पता? आप लोग बता क्यों नहीं रहे? और आप लोग डर क्यों रहे हो?" विजय को तो कुछ भी समझ में नही आ रहा था की क्या हो रहा है? और कया नही? कबीले के सरदार ने फिर से अपना एक हाथ विजय के दाएं कंधे पर रखा और कुछ मायूस सा होते हुआ बोला "बेटा, तुमने उन डाकुओं से लोहा लेकर अच्छा नहीं किया। वे डाकू अपने आप चले जाते तुम्हे क्या जरूरत थी उनसे लड़ने की?" विजय आंखे फाड़ फाड़कर उस कबीले के सरदार की और देखने लगा और दो कदम पीछे हटा और फिर अपने हाथ चौड़े करके बोलने लगा "कमाल है आप लोगों की? एक तो मैंने अपनी जान पर खेलकर आपको उन डाकुओं से बचाया और आप कह रहे है की मुझे उनसे लड़ना नहीं चाहिए था। तो क्या मैं भी आपकी तरह गूंगा बनकर खड़ा रहता और कुछ न बोलता।" "बेटा तुमने जो कुछ किया वो तुम्हारे लिए सही होगा लेकिन हम तो अब मुसीबत में पड़ गए ना। तुम तो जहां से चले जाओगे। लेकिन अब उस असली कहर से तो हमें ही निपटना पड़ेगा ना।" "असली कहर।" विजय ने कुछ हैरानी से पूछा। "हां बेटा, मंगल डाकू तो सिर्फ एक मोहरा था। डाकुओं का असली सरदार तो वो कहर डाकू अरहान है।" एक व्यक्ति आगे आते हुआ निराशा से बोला। "अगर डाकू अरहान को तुम्हारे बारे में पता चल गया तो वो तुम्हें तो मार ही डालेगा साथ ही साथ हम सबको भी मार देगा।" कबीले के सरदार ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा। "सिर्फ डाकू अरहान ही उस आदमखोरी तलवार का पता जानता है।" उस लड़की ने विजय की और देखते हुए कहा। "वो डाकू अरहान अब इसी और आ रहा होगा, तुम जहा से चले जाओ।" कबीले का सरदार फिर से बोल पड़ा। "चला जाऊं, वह भी आपको इस हालत में छोड़कर चला जाऊं ,बिल्कुल नहीं। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूंगा। मैं आप लोगों की तरह डरपोक नहीं हूं। मैं उन डाकुओं से लडूंगा, चाहे मुझे अकेला ही क्यों न लड़ना पड़े। मैं यहीं पर रहूंगा और उस डाकू अरहान से आदमखोरी तलवार का पता पूछ कर ही रहूंगा।" विजय ने सब की ओर गुस्से से देखते हुए कहा। फिर कुछ देर के लिए सारे ही खामोश हो गए। विजय ने फिर से अपनी चुप्पी तोड़ी और गुस्से से जोर से बोल पड़ा " आप लोग एक बार तो सोच कर देखिए। अगर मैं अकेला उन चार डाकुओं को हरा सकता हूं, तो क्या हम सब लोग मिलकर उस डाकू अरहान को नहीं हरा सकते। अगर आपमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं हैं तो अपने घरों मैं छिप जाओ। डर डरकर ऐसी जिंदगी जीने से तो मर जाना ही अच्छा है।आपक सब के मन में सिर्फ एक डर बैठ गया है। आप उस डाकू को आसानी से हरा सकते हैं। यह डर हमें तब तक ही डराता है जब तक हम इस डर से डरते हैं। विजय ने गुस्से से कहा। सब लोग विजय के चेहरे की और देखने लगे। विजय फिर से बोल पड़ा "क्या आप लोग मेरा साथ देंगे? विजय की यह बात सुनते ही पूरे कबीले में एक अजीब सी खामोशी छा गई। इतने में वह छोटी सी लड़की विजय के पास आगे आई और बोली "मैं तुम्हारे साथ हूं।" फिर एक और व्यक्ति बोला "मैं भी तुम्हारे साथ हूं।" फिर सभी लोग बोल पड़े "हम सब तुम्हारे साथ हैं। हम सब मिलकर उन डाकुओं से लड़ेंगे।" इतने में जंगल की ओर से कुछ आवाजे आने लगी। सब लोगों ने उसे और देखा और देखते ही रह गए।। भूपेंद्र सिंह रामगढ़िया।।