शरद भूषण मोंगरा 23 Apr 2026 कविताएँ धार्मिक 885 0 Hindi :: हिंदी
"रूह" (आत्मा) धुर धाम के लिए चली, मैं रब के दर की थी कली भुला चुकी थी आप को, थी काल में रली मिली मैं ढूंढती सी शांति को इस धरा पे जो न थी वो शांति स्वयं मुझ ही में बैठ कर के मौन थी संसार में ऐसी फंसीं रिश्तों के माया जाल में मैं फंसतीं ही चली गई दुःखों के इस जंजाल में मरती जन्मी बौझ ढोती नित नए शरीरों का मैं किस तरह से चौला ओढ़ू मालिक के मस्त फ़क़ीरों का कोई मुझे भी नाम दे मुर्शीद मिले धुर धाम का युक्ति बता दे नूर की, दिया जले जो नाम का सतगुरु वो भेद है, जो हक मुकामे जानता माया में है घिरा जहां(संसार), सत्य नहीं पहचानता ये प्रेम का मजमून है,रस्ता रुहानी ज्ञान का आई जहां से जा मिलूं सफ़र करूं सतनाम का। (यहां रूह पुनः अपने घर अर्थात मालिक के धाम जाने का प्रयास कर रही है।) शरद भूषण मोंगरा।