Pravin Chaubey 15 Feb 2025 कविताएँ देश-प्रेम #shayari#kavita#kahniya#goan#mitti#poeam#kavy#hindi 6648 0 Hindi :: हिंदी
न जाने क्यों शहर में आकर भी,
मन मेरा वहीं ठहर जाता है,
जहाँ सुबह ओस में भीगे खेत,
और हवा में सोंधी ख़ुशबू आती है।
जहाँ सूरज की पहली किरण,
माँ की हथेली पर गिरती है,
और चूल्हे की आँच में पकती रोटी,
घर भर को तृप्त कर देती है।
जहाँ आँगन में बरगद की छाँव,
हर दोपहर ठंडक देती है,
और चौपाल पर बैठी बूढ़ी आँखें,
सदियों की कहानियाँ कहती हैं।
जहाँ खेतों में मेहनत के मोती गिरते हैं,
और सोने की फसलें उग आती हैं।
जहाँ रिश्ते शुद्ध पानी से भी साफ़ हैं,
और इंसानियत की मिठास हर बात में है।
शहर में चकाचौंध है, पर अपनापन नहीं,
वहाँ दौड़ है, मंज़िलें हैं, पर ठहराव नहीं।
गाँव की उस कच्ची सड़क पर,
अब भी मेरी रूह चलती है,
क्योंकि वहाँ मेरा बचपन दौड़ता था,
वहाँ मेरी यादें पलती हैं।
"शहर सिर्फ़ सपनों के लिए है,
पर गाँव... अपनों के लिए है
✍️ प्रवीण चौबे
I am the Restuarant Purchase Manager My hobby is writer...