Rambriksh Bahadurpuri 07 May 2026 कविताएँ समाजिक #रामवृक्ष बहादुरपुरी#कविताएं#इंसानियत#अम्बेडकर नगर पोइट्री साहित्यिक मंच 616 0 Hindi :: हिंदी
इंसानियत है नियत का खेल कुछ ऐसा समझ से दूर जो देख हिय द्रवित नयन न रोक पाता नीर है हैं प्यार ममता से बंधा इंसान हो या जानवर है कौन ऐसा यहाॅं हृदय न जिसके पीर है, दूसरा मां जन्म पाती जन्मते औलाद से प्यार ममता के सिवा फिर भी तनिक न रोष है असहन पीड़ा है सहती न सोंचती आबाद को धन्य है जननी धरा पर धन्य तेरा कोख है, एक छोटी सी घटित घटना दिया झकझोर मन जन्म दी नवजात शिशु वह मेमना को कोख से स्तब्ध था नि:शब्द मैं कि हो गया था शून्य तन लौट कर आयी हो मानो बकरी जिंदा मौत से , गुजरा हुआ होगा समय मुश्किल से दो तीन दिन हालात बिगड़ी इस कदर बकरी कभी न उठ सकी असहन पीड़ा से पीड़ित बेखबर सी वह हुई क्या पता जीवन का उसके अंतिम ही थी यह घड़ी दुधमुंहे बच्चे थे भूखे व्याकुल स्तनपान को पास जाकर सूंघते मुख मां के ममता प्यार से देखते ही देखते ममता बिखर कर रह गयी छोड़ कर अब वह चली थी खुद को इस संसार से मरते मरते बिक गयी वह चिकवा के अब हाथ में मरने की थी सांस अंतिम वह रेत कर मारी गयी इंसान भी कितना यहां है स्वार्थी व चालची मरते मरते सोचती पछताते ही वह रह गयी कांपने धरती लगी थी देख कर इंसानियत चार पैसों के लिए इंसान कितना गिर गया छोड़ कर औलाद अपनी वह गयी संसार से इसके बदले एक और इंसान को जो मिल गया। रामवृक्ष बहादुरपुरी अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश
I am Rambriksh Bahadurpuri,from Ambedkar Nagar UP I am a teacher I like to write poem and I wrote ma...