Ajeet 20 Feb 2026 कविताएँ दुःखद 1891 0 Hindi :: हिंदी
फूलों का वो आंगन न जाने कहां गया मेरी बचपन की हंसी का वो सावन ना जाने कहां गया। वो मिट्टी के खिलौने वो बचपन के सिरहाने जिन्हें मैं घर के आंगन में बनाकर संजोया करता था, ना सफ़र की चिंता थी ना कमाने की चिंता थी बस यूं ही दोस्तों के साथ खेलने जाया करता था, कभी चांद से पूछने बैठ जाया करता था तो कभी शाम को उदास बैठ जाया करता था, सोचता था और मुस्कुराया करता था कहीं मेरा बचपन मेरे हाथों से फिसल न जाए कहीं मेरा बचपन मिट्टी में सिल ना जाए यह सोच में अचानक घबरा जाया करता था, नंगी सड़क पर चलता फिरता यूंही स्कूल पहुंच जाया करता था स्कूल की घंटी का वो शोर शराबा मन को कितना महाकाय करता था, जब-जब में स्कूल में खेला करता था तब तब में बचपन को गाया करता था छोटी-छोटी खुशियों में मेरा बचपन कितना मुस्कुराया करता था।