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प्रकृति

akhilesh Shrivastava 08 Sep 2024 कविताएँ समाजिक प्रकृति का मानव पशु पक्षियों को अनुपम उपहार 7808 0 Hindi :: हिंदी

*कविता*

                  *प्रकृति*


मैं प्रकृति हूं जीवन भर
सबका साथ निभाती हूं।
नि: स्वार्थ सेवा करती हूं 
सबके मन को भाती हूं।

छल छल बहती नदियां से 
मैं प्यारा संगीत सुनाती हूं 
हरी भरी पर्वत माला से 
सबका मन बहलाती हूं ।

मौसम बदल बदल कर मैं 
सबका साथ निभाती हूं 
ऋतु बसंत में आकर मैं 
प्रेमियों का मन बहलाती हूं।

पेड़ों पर बैठे पक्षियों की 
करतल धुन तुम्हें सुनाती हूं 
जंगल बनकर प्राणियों का
आश्रय स्थल  बन जाती हूं।

सावन में करके श्रंगार मैं 
दुल्हन सी सज जाती हूं 
हरी भरी चुनरी फैलाकर 
गीत प्यार के गाती हूं।

पशु पक्षी मानव सबसे मैं 
रिश्ते खूब निभाती हूं 
 पर मानव से बदले में 
धोखा कष्ट ही पाती हूं।

रूठ गई जो तुमसे मैं तो 
जीवन सबका मिट जायेगा
इस धरा से मानव तेरा 
नामो -निशान मिट जायेगा।


रचियता ---अखिलेश श्रीवास्तव एडवोकेट जय नगर 
जबलपुर

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