Akash Tripathi 26 May 2024 कविताएँ दुःखद 8936 0 Hindi :: हिंदी
कविता का शीर्षक-" प्यासी धरती" तपन बड़ी है वसुधा में अब रहम करो सूरज मामा। प्यासी वसुधा खोज रही है कहां छुपे चंदा मामा।। मानव ने वृक्षों का दोहन करके 🌿🍃प्रकृति नसाया है। तभी तो सारे जग में वसुधा की तड़पी यह काया है।। मेघा ने वसुधा में पहले जैसा आना छोड़ दिया। प्यासी धरती जलज निहारे मानव ने दिल तोड़ दिया।। सरिता तटनी में पहले जैसा अब इतना मेल नहीं। सूरज की किरणों को सहना बच्चों का अब खेल नहीं। । वसुधा का हक छीन लिया मानव सारे संसार में। कृत्रिम कूलर एसी की ठंडक बढी मांग संसार में। । पाथिक तरु की शीतल छाया से मानो अंजान बने।। आया नहीं बसंत समय से वसुधा तरु संवाद करें। वृक्ष दलों के दोहन से वसुधा ने खोई ताकत है। नीर बहे ना झरना झर -झर धरा में मातम छाई है। । सारे जग के पशु पक्षी को अपना नीड बचाना है। मानव का आतंक धरा में, सृष्टि हमें बचाना है।। बेजुबान पशु पक्षी मानव बूंद-बूंद को तरस रहे। तपती धरती गगन निहारें बादल भी कब बरस रहे।। प्राणवायु अमृत वसुधा में, मानव से अब रूठ गई। वृक्षों में जो निकली किसलय, नौतपनों में सूख गई। । वसुधा के आंचल को सूर्य के तपन से हमें बचाना हैं। प्रकृति धरा में वृक्ष लगाकर इंद्र से जलज कराना है।। गांव -गांव और गली -मोहल्ले जन-जन को समझाना है। मानव को अब सूर्य देव की तपन से हमें बचाना है। । कविरा इतना कह कर स्याही से संपर्क हटाता है। मेघा भी वसुधा के चरणों में आकर झुक जाता है। लेखक- आकाश त्रिपाठी "आशु" ग्राम कृष्णगढ़ रामपुर बाघेलान जिला सतना मध्य प्रदेश।