प्रवीण कुमार 09 Oct 2025 कविताएँ दुःखद 4065 0 Hindi :: हिंदी
क़ातिल और क़त्ल से शाम डर है हमें। सुबह भी ज़ालिम क़ातिल न हो जाए। इसलिए इस मिट्ठे पानी की अदा पर हम यकिन कर बैठेंगे। क़ातिल और क़त्ल से शाम डर है हमें। राम ही ने हराम कहा, रावण को। ज़माने ने तो विद्वान कहा। इन्सान ने इन्सान को बदनाम किया। जो संसार की आदि-शक्ति बनी आज औरत ने ही औरत को इन्सान की बड़ी कमी कहा। क़ातिल और क़त्ल से शाम डर है हमें। औरत ने ही औरत के विश्व़ास को थोड़ा है। ये कामयाबी कैसी है? बस, समय ही तो चल पड़ा है । एक बात है जो अपने -आप में अधूरी है साथ ही इसका निर्णायक मैं भी नहीं। क़ातिल और क़त्ल से शाम डर है हमें।