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तपन

Rambriksh Bahadurpuri 19 Jun 2024 कविताएँ समाजिक #Rambriksh Bahadurpuri #tapan per kavita #ambedkarnagar poetry 7370 0 Hindi :: हिंदी

तपन 

क्या स्वर्ग की 
कल्पनाएं यही है 
भभक सी उठी है 
दहकती जमीं है 
सुबह शाम भी 
अब दुपहरी जली है 
हातास व्याकुल 
हैं पशु पक्षी नर भी 
चटक सी उठी यह 
धरती जमीं है

तपन से है जीवन
अहर भी तहर भी 
चहुं दिस मची है 
हर क्षण कहर भी 
मर कर भी कोई 
बचा ना सकेगा 
तड़पते बिलखते 
सभी हैं सभी हैं,

सभल जा हे! मनुजों 
समय भी अभी है 
बचा ले वनों को 
यह जीवन तभी है 
बचेंगे पशु पक्षी 
मनुष्य तुम बचेगा 
नहीं तो लिगलने  
तपन यह खड़ी है। 

         रचनाकार 
     रामबृक्ष बहादुरपुरी 
अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश

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