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कविता -आंगन बांटों ना आंगन बन्धु! आज तोड़ो ना रिस्तें मधुर आज। तुलसी सी मां-ममता महके घर का कोना कोना गमके जीवन की ज्योति read more >>
आशाओं से खिली चाहतें, जो रहें कर्म से लिप्त! ये चल कर लै कर ज्ञान धरा पर, करें धरा संतृप्त!! है ज्ञान अनुठा करी गर्जना, read more >>
शीर्षक (भोले नाथ की नगरी काशी) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) काशी का नाम ही काफी है। भोले नाथ के बिना किस काम की काशी है। भोले नाथ ही तो read more >>
जहां आप, अपने रहकर भी हो लुप्त। आप ही सुस्थ, बाक़ी सब सुस्त। जिस शिखर पर आप, अपने बहुत पीछे छूट जाएं। चाहकर भी आपका, नजरों से नाता टूट जा� read more >>
चल मुसाफिर एक राह पे चल जिंदगी के एक गुमराह पे चल हर लोग है बुरे भले तुम्हें चलना है अकेले जिस राह पे अनेक कांटा है उसी राह पे जिंदग� read more >>
दूसरे के बुराईयों को उछालने वाले लोग अपने ही दामन में दाग लगाए बैठे है। read more >>
शोहरत के लिए ही कर रहे हो न ठीक है,लेकिन मरोगे तो मिट्टी में ही सोना परेगा,सोने के प्लेट में नही। read more >>
मेरी परछाई भी मेरे से दो कदम हमेशा आघे ही रहती है,क्योंकि उसे पता है मेरी पहचान उजाले में होती है अंधेरे में नहीं। read more >>
दोस्ती और मोहब्बत में फर्क ही क्या रह गया है, क्योंकि दोनो से वक्त पर वफा नही मिलती। read more >>
निराश मत होना बेटा ये गलत फेमी में मत रहो की मैं ही परेशान हूं ,सब लंका में आग लगी हुई है। read more >>
दुखी मत होना बेटा की लोग तुम्हें पसंद नही करते क्योंकि तुम्हारा बाप तुम्हारे जैसे बेटे पर गर्व करता है। read more >>
तुम्हारा मोहब्बत वैसा हो हो गया है,जैसे गेट पर खड़ा शाहील विक्षा मांगता है। read more >>
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