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मेरी माँ के आँगन से,ये शहर छोटा लगता है
मेरी माँ के आँगन से , ये शहर छोटा लगता है। मेरी माँ के दीपक से, ये सूरज फीका लगता है।। हम लाख कमा ले दुनिया में ,मनचाही दौलत। पर माँ के �
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बरसता पानी
लड़की :- हाय ! रब्ब मेरी जवानी आ गई कब टिप - टिप बरसता पानी आग लगी अंग - अंग में दामन को सजाना है तेरी रंग में अंग - अं�
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कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता
कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता/ में भी आसमान मे उड पाता तो इस दुनिया की नस्वर्ता को देख पाता, कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता/ कभी इस
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तुम होते तो कितना अच्छा होता
तुम होते तो कितना अच्छा होता/ हर वक्त हर पल अपना सा होता तुम होते और बस एक में सात पल सात जिया करते, तुम होते तो कितना अच्छा होता/ ये जी�
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वंदना
ब्रह्मचारिणी ज्ञान दायिनी हंसवाहिनी माता विद्यारूपा ब्रह्मा स्वरूपा कमलवासिनी माता सुरसादेवी, वसुधा तीब्रा महाभद्र महाबला गीता
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वहाँ मेरा श्याम नजर आता हे
जहाँ ना कोई उम्मीद का सहारा नजर आता हे वहाँ दिल बड़ा घबराता हे एक पल याद करूँ तू वहाँ मेरा श्याम नजर आता हे/
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मुसाफिर तुम वादे हजार मत करना
प्रण जो ले लिया इस झूँठ की दुनिया में मुसाफिर तुम वादे हजार मत करना/ जीवन हो जाये कठपुतली जेसा फिर भी सपनों का सोदा मत करना, भावनाए
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प्रकृति अनुपम कृति हैं-यह इसकी पहचान है
प्रकृति अनुपम कृति हैं, यह इसकी पहचान है। कहीं पेड़ों की छांव में, पक्षी बैठे शान्त से कहीं अपनी चोंच खोले, ध्वनि करते आन से। कहीं बरसा
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मत खोल निगाहें ओ रब्बा,
मत खोल निगाहें ओ रब्बा, देखने को जी नही है चाहता ना हो दोबारा मनुष्य मे जन्म, ये संसार है बुराईयो का मारा
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समाज
ये समाज एक तेज तलवार है इसमें जीत भी हार है। इंसानियत तो अब कही है ही नहीं हर तरफ बस लोगों में तकरार है ये लोग जो हैं बड़े होते बेरहम ह�
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शीर्षक (पिता)
शीर्षक (पिता) मेरे अल्फ़ाज़ सचिन कुमार सोनकर माँ का प्यार तो तुमको याद रहा। क्या पिता का प्यार तुम भूल गये। एक पिता को समझना आसान नही पि�
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शायरी
शहर की आबोहवा में ,कुछ इस कदर परिवर्तन होने लगे हैं हुजूर ! खंडहर भी बयां करने लगे हैं, कि इमारत भी क्या शानदार थी।।
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