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जो छूटा
जो छूटा जहां उसको वही रहने दिया, सोचा नहीं जो हुआ उसे होने दिया; थम जाएं ऐसों से ख़ुद न मिलने दिया, समझाया खुद को न पैरवी करने दिया, अपना
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जो छूटा
जो छूटा जहां उसको वही रहने दिया, सोचा नहीं जो हुआ उसे होने दिया; थम जाएं ऐसों से ख़ुद न मिलने दिया, समझाया खुद को न पैरवी करने दिया, अपना
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टूटे हुए अक्स
टूटे हुए अक्स समेटने मैं चला, अपनी कहानी लिखने मैं चला, अकेले चलने का हुनर है मुझमें, अपने वजूद को समेटते मैं चला, माज़ी की यादों को पीछे
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ज़माने भर का
ज़माने भर का ग़म उठाए फिरते हो क्या रंज है जो छिपाए फिरते हो कभी तो आओ देहरी पर हमारे हर गम को भूल जाओगे शब से पहले गर मुस्कुराओगे तो ज�
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ढलती उम्र – एक एहसास
कभी जो कंधे दुनिया उठाया करते थे, आज खुद सहारे की तलाश में रहते हैं। जो कदम बेफिक्र हवाओं में उड़ते थे, अब हर मोड़ पर ठहरने लगते हैं। आ�
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ढलती उम्र – एक एहसास
कभी जो कंधे दुनिया उठाया करते थे, आज खुद सहारे की तलाश में रहते हैं। जो कदम बेफिक्र हवाओं में उड़ते थे, अब हर मोड़ पर ठहरने लगते हैं। आ�
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ढलती उम्र – एक एहसास
कभी जो कंधे दुनिया उठाया करते थे, आज खुद सहारे की तलाश में रहते हैं। जो कदम बेफिक्र हवाओं में उड़ते थे, अब हर मोड़ पर ठहरने लगते हैं। आ�
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गाँव – मेरी जड़ों की खुशबू
गाँव – मेरी जड़ों की खुशबू नंगे पाँव वो पगडंडी, अब भी रुला देती है, जहाँ बचपन ने कंचों की दुनिया रची थी। वो कच्चे मकान की मिट्टी, जो हाथ�
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गाँव – मेरा पहला प्यार
गाँव की गलियाँ, वो बचपन की बातें, माँ की ममता, दादी की सौगातें। बिलकुल कच्ची पर दिल से पक्की, वो मिट्टी की खुशबू, वो अमर बेल की लच्छी। त�
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गाँव – मेरी पहचान
वो मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू, वो खेतों की राहें, जहाँ हर सुबह उम्मीदों की किरणें हैं चाहें। नदी के किनारे वो रेत की बिछौनी, जहाँ बचपन ने ल�
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गाँव की मिट्टी
गाँव की पगडंडियाँ, बचपन की राहें, माटी की ख़ुशबू, खेतों की बाहें। पलाश के पेड़ों की छाँव निराली, सरसों के फूलों की चूनर मतवाली। चौपाल
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एक हो सकेना हम
एक हो सकेना हम क्यों लेती इसका घम प्यार के पंछी हम पर मिल सकेना हम ||धृ || एक हो सकेना हम.. संगीत.. मिले तो क्या डरना पर हालात है मुश्कि�
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