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अवसर-संघर्ष की कुछ कीमत नहीं
ये जिन्दगी पा के लोगों ,से बहुत कुछ सिखा है। हमनें इतना ,व्यर्थ है। यहाँ, हर एक जीवन जीने का पैतरा संघर्ष की कुछ कीमत नहीं , अवसर ,अवसर
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सत्य पर पर्दा था उठा दिया पर्दा कोई
"सत्य पर पर्दा था कोई.. उठा-ए-दिया पर्दा कोई.. सजा-ए-मौत देखो फिसल गई,, सत्य-ए-जीवन अमर कर गई"!!!! -मोती
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दिसम्बर का आगमन
*दिसम्बर का आगमन* दिसम्बर तुम आते हो सभी को नचा जाते हो यह महीना ठण्ड की पेटी पुरा महीना खुली रहती कापे तन कापे मन दिसम्बर तुम आते �
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बच्चें के संस्कार
एक गांव में चार महात्मा घूमने आते हैं।वह भिक्षा मांग रहे थे। गर्मी के दिन थे।भीख मांगते दोपहर हो गया ।एक नीम का पेड़ था।वह उसके नीचे ब�
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समय की चक्की पीसे हरेक को
समय-ए- चलती अपनी गति को, जीवन-ए- चले अपनी गति को,, पर-ए- हक दिया, करना क्या आपको, समय- ए-चक्की पीसे हर को।।।। -मोती
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तेवर-ज़ेवर से बदलते तेवर
किसी का काम से, किसी का नाम से। किसी का याम से, किसी का दाम से। किसी के हाथ फेरने से, बदलता कलेवर। ज़ेवर से बदलते तेवर। किसी का आलंबन से,
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टूटे हुए सितारा से हमने
टूटे हुए सितारा से हमनें, उनको पाने की ख्वाईस केह दी थी, मुकमल हो मेरे प्यार का जहाँ, इसलिए ख़ुदा से मेने तुझे अपने हक मे मांगी थी
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किट्टू और मिठ्ठू
एक छोटा सा प्यारा बच्चा जो पांच साल का था।वह अपने माता पिता के साथ रहता था।उनका अपना बाग था।वह अपने बाग में खेलने जाता था घर के पिछे ही �
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कोई रास्ता बता दो
जब अपने ही अपनों का खून बहाने को उतर आए तो किस पर करूं एतबार!! ए दिल तुम् कोई रास्ता बता दो। कई वादे , किये मिलकर मुझसे। सुबह किए हुए बा�
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तुम लौट के ना आए
साथ जीने मरने की खाई थी तुमने कई कसमें जिंदगी के इस सफर में साथ चलने की रखी थी शर्तें कई जीवन के सफर में हम दोनों ने तय किए थे कुछ वादे �
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सियरा के देहियां पर बघवा कै खाल बाय
कविता -सियरा के देहिंया पर बघवा कै खाल बाय सियरा के देहिंया पर बघवा कै खाल बाय कहां गइल सब नाता रिस्ता ,भइल बहुरंगी चाल बाय घूम रहे हैं
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हारते हुए जीतना सीखा है
गलत, कदम , नहीं थे। हमारे , ये तो साथ निभाने वालों के दिल कमजोर थे । वरना ,अपना तो ,अब भी वही सफर है। जहाँ, से हर दिन हारते हुए जीतना सी
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