अक्सर मैं दु:खी हो जाती हूँ ,
जब किसी दूसरी औरत को,
देखकर तुम्हारी आंखें विस्तृत,
हो जाया करतीं हैं तब....!
या फिर मेरी पीठ पर गढ़तीं हैं ,
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तुम खुश हो,
या दुखी,
मुझे नहीं मालुम,
क्योंकि
कई जमाने से,
तुम से नहीं मिला...
परन्तु मैं,
मैं हमेशा,
तुम खुश होगी,
यही मिथ्या
सोच कर,
रो� read more >>
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ना कुछ देना था अपने हाथों में।
ना कुछ लेना था अपने हाथों में।
वो सब उस खुदा के हाथ है।
वो कब लेता है कब देता है।
ये सब उस खुदा read more >>
(मुक्तक छंद)
घर के रहे न घाट के, थोड़ा अब तो सोच।
चलें सँभल कर अब जरा,रहे नहीं संकोच।
मैया नैया पार कर,जीवन कर गुलजार_
बढ़े बुद्धि में तेज read more >>