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प्रेम की मजधारा
ये प्रेम की मजधारा तू बेहती चल सुखों में सुख देती चल मैं जीने की हर बातों को गुलाम करता हूं बस तू आनंद पिरौती चल क्या जीना दुखों में स�
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इतनी सी गुज़ारिश है
इतनी सी गुज़ारिश है किसी बेज़ुबान को मत सताओ सुबह शाम बस इक रोटी इन लावारिस कुत्तों को खिलाओ - त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’
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आ नहीं सकती
बुढापा आ जाए तो जवानी लौट कर नहीं आ सकती मौत आ जाए तो जिंदगी दुबारा नहीं मिल सकती। धन्यवाद
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"शूरवीर"
अपने पर जीत हासिल, करे वो शूरवीर। उसी के वश यह शरीर, शेष मन के गुलाम।। मोती-
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मेरी पुकार प्रियतमा से
काऊ कोऊ प्रियतमा से तौऊ बिन जिव नौऊ भय! लागु मन ताऊ से जिव अब काऊ भय!! मझताऊ थाऊ से मै तौउ न पेऊ! आवु मै घिरी-घिरी जाऊ न पेऊ!! अर्थ:- कहने
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"प्रेरणा"
असफल होना बड़ी बात नहीं है। असफलता को- स्वीकार करना बड़ी बात है। अगर हमने- स्वीकार नहीं किया। तो चलना सीख जाएंगे।। मोती-
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"तारणहार"
कण-कण में बसता, जग में व्यापक वो। रहता सबके अंदर, वहीं नीयता तारणहार।। मोती-
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"प्रकृति मनोरम"
अद्भुत प्रकृति मनोरम, गुलशनें हैं बहार। चहकता महकता चमन, इश्क है बेपनाह।। मोती-
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इंतजार
कब तक करूंगी मैं आपका इंतजार सब्र मेरे दिल का टूटे सनम हर एकबार। धन्यवाद
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पूछो यूं तो हाल
पत्ता टूटा डाल से यू काहु पूछो डाल का हाल! डाल तौहे पत्तो की जड़ी पूछो तो पत्ते का हाल!! अर्थ:- व्यक्ति जिस योग्य बनने के लिए प्रयास �
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पर्यावरण और हमारी संस्कृति
भारतीय संस्कृति वन या अरण्य संस्कृति कहलाती है।हमारे पूर्वज ने पृथ्वी को माता माना है।यही कारण था कि हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्क�
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शायरी
जिंदगी दर्द की चुभन से लादी है मगर तेरी यादों का पेहेरा दबा बनगई हम चलती सफर में तन्हां थे मगर तेरे ख्यालों का साया हमनबा बन गई।
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