मै जो भी लिखूंगी अब तो बेबाक लिखूंगी – नेहा श्रीवास्तव

मै जो भी लिखूंगी अब तो बेबाक लिखूंगी – नेहा श्रीवास्तव

मै ज्यादा कुछ तो नही बस जज्बात लिखूंगी, जो अपने ऊपर है बिता वही हालात लिखूंगी। कब तक किसी की खामोशी की मै शागिर्द रहूँ, जिसे जुबाँ भी ना कह पाये वही बात लिखूूंगी। कोई जी रहा मुफलिस मे तो कोई गुमनामी मे, कट जाती है जिनकी सड़कों पर वह रात लिखूंगी। बैठी है फूटपाथ
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मुझको भी कवि बना दे अब कोई कलम तो ऐसी हो – नेहा श्रीवास्तव

मेरे बिखरे शब्दों को अंजाम दिला दे, अब कोई कलम तो ऐसी हो। कोरे पन्ने को भड़का दे , अब कोई कलम तो ऐसी हो। हालात की चपेेटों कोई टूट गया कोई बिखर गया, पानी मे आग लगा दे अब कोई कलम तो ऐसी हो। ज़ज़्बात लिखूं ऐहसास लिखूूं , सूझता नही मै क्या लिखूं
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प्यार की बातें मुझे अब केवल किताबी शब्द लगते हैं – नेहा श्रीवास्तव

कैसे भूला दूँ मै रहमत खुदा की सारी, एक दफा फिर वह मोतबर लगा मुझे . अपने वजूद को लेकर मै दर बदर थी शायद, हालात अपना पहले से बेहतर लगा मुझे. मेरी जरा सी भूल पर चर्चे बहुत हुयें, हर कोई खुद मे बेबस लगा मुझे. जरा सी शोहरत पर गुरुर हो गया उसे
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पत्थर ना फेंको मेरा सीसे का घर है – नेहा श्रीवास्तव

दुआएं ,बरकते मुझे लगती नही सब बेअसर है, हम भी संजीदा रहने लगे हैं सबको खबर है. ै सब मगरुर हैं अपने गम मे कुछ कहते नही, कोई मुस्कुराता नही यहाँ, ये कैसा शहर है. कोई दुआ देता रहा मुझे मेरी मंजिल मिले, जो खत्म ना हो सके मेरा ऐसा सफर है. शरीफों पर तोहमते
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प्रिये अब तो प्रेम भी online हो गया है – नेहा श्रीवास्तव

याद है वह जमाना जब तुम्हे मै खत लिखा करता था , और अपने प्रेम का इजहार किया करता था . नजरे ही काफी थी सबकुछ समझने के लिये, collegeके पीछे तुम्हारा इन्तेजार किया करता था. प्रिये अब तो सबकुछ online हो गया है , मिलना जुलना भी बे time हो गया है. अब प्रेम
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हम दाग से बचने के लिये भी कुछ दाग रखते हैं – नेहा श्रीवास्तव

कम लोग हैं ऐसे जो बिना झिझक के अपनी बात रखते हैं, हम भी अपने दिल मे कुछ जज्बात रखते हैं. दोस्तो की फितरत जाने कब बदल जाये, इसलिये दुश्मनो को भी हम अपने साथ रखते हैं. जिन्दगी सिवाय झूठ के कुछ भी नही , जो मिल ना सके अक्सर उसी पर हाथ रखते हैं.
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मै लड़की हूँ डरी सहमी लाचार – नेहा श्रीवास्तव

मै लड़की हूँ डरी सहमी लाचार | हर रोज घर से निकलती हूँ एक ही डर के साथ | गली कूचों मे कोई कर रहा होगा इन्तेजार | कहीं बजेगी सीटी तो कहीं होगा अश्लील शब्दों का प्रहार | किसी के लिये मै सबकुछ तो किसी के लिये शिकार | मै लड़की हूँ डरी सहमी
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फासले भी जरूरी हैं – नेहा श्रीवास्तव

चाँदनी रात मे भी अब तपिश सी लगती है, जैसे चाँद आफताब बनकर आया हो, मुक्कदर से वही मिला , जैसे हिस्से मे मेरे इंतिखाब बनकर आया हो. ऐसा मोजजा भी किस काम का जो मेरे काम का नही, दुश्मन भी ऐसे गले लगा जैसे पुराना यार बनकर आया हो. फासले भी जरुरी हैं कुछ
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आज बयां करती हूँ मै हालात एक किसान की – नेहा श्रीवास्तव

आज बयां करती हूँ मै हालात एक किसान की, मुफलिसी मे जी रहे मजबूर उस इंसान की. छत टपकता है उसका गिरवी मकान है, अन्नदाता का ही बाकी लगान है. साल भर मेहनत करके दाना उगाता है, और खुद ही भूखा रह जाता है . जितनी लागत पर वह अनाज बोता है, उसका आधा भी
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वह मर्यादा वह लिहाज कहाँ है आजकल – नेहा श्रीवास्तव

जो बेपरवाह था कभी खैर -ख्वाह निकला है आजकल , अपनो को अपनो की फिक्र कहाँ है आजकल. सबकुछ खुलेआम -खुलेआम सा दिखता है वह मर्यादा वह लिहाज कहाँ है आजकल . औरत का गहना उसका श्रृंगार होता है वह अदब वाला लिबास कहाँ है आजकल साथ अपनो के साथ भी बिताया जाये वह प्यार
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