हम हैं देशी – हम हैं देशी

हम हैं देशी – हम हैं देशी

कुमार विश्वास के गीत हम हैं देशी में उन्होंने कुछ ज्यादा ही फेंक फेंक कर लिखा पेश है उनके गीत की तर्ज पर समाज को आईना दिखाता हुआ मेरा यह गीत जिसे फेंक फेंक कर नही लपेट लपेट कर लिखा है एशिया के हम परिंदे ,लूटना है जद हमारी जानते हैं चाँद सूरज, फेंकने की
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वो हमारी महफ़िल में आना भूल गए – राहुल रेड

वो हमारी महफ़िल में आना भूल गए हम भी उन्हें याद दिलाना भूल गए मोहब्बत में जब से ठोंकर खाई है तब से हम भी दिल लगाना भूल गए भूलने की चाह में भूल गए खुद को जिसे भूलना था, उसे भुलाना भूल गए दौर-ए-सुखन में मसरूफ़ रहे इतना ज़माने में शहोरत कामना भूल गए
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लिखते-लिखते थककर हम चूर हो गए – राहुल रेड

लिखते-लिखते थककर हम चूर हो गए जो नही लिखते आज वो मशहूर हो गए साहित्य के नाम पर परोस रहे अध्यात्म फिर कहते हो युवा इससे से दूर हो गए लिखता नही कोई तर्क और विज्ञान पर अंग्रेजी सीखने को लोग मजबूर हो गए चाटुकार्ता की बातें करते मंच पर कवि जैसे सत्ता के बंधुआ
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लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते हैं – राहुल रेड

कुछ गाड़ियों में चलते हैं, कुछ टुकड़ो पर पलते हैं कुछ ए सी में रहते हैं, कुछ सड़को पर सड़ते हैं इन्शानियत को भूलकर लोग धर्मो के लिए लड़ते हैं बुजुर्गो को ठुकराकर लोग गाय को माता मानते हैं दौलत के नशे में अपने तक को नही पहचानते हैं इस दुनियाँ में भी लोग अजीबो
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कर्म को त्यागकर जो तकदीर के सहारे हैं – राहुल रेड

कर्म को त्यागकर जो तकदीर के सहारे हैं न वो खुद सुधरे न हालात उन्होंने सुधारे हैं भीख माँगते अच्छे खासे लोग खुदा के नाम पर शाम को जाकर पीते दारू ये कैसे बेचारे हैं सीरत का कोई मोल नही सूरत वाली दुनियाँ में सूरत के आगे ही अक्सर सीरत वाले हारे हैं ऊब गए
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अपनी अपनी राह इंतिखाब कर लेते हैं – राहुल रेड

अपनी अपनी राह इंतिखाब कर लेते हैं हालत अपनी और ख़राब कर लेते हैं बिखरते रिश्ते मुझसे संभाले नही जाते आओ आज बैठकर हिसाब कर लेते हैं तुम ऊब गए हमसे हम ऊब गए तुमसे अब बंद मोहब्बत की किताब कर लेते हैं कहने को और कुछ अब बचा ही नहीं तो आखरी सवाल जबाब
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जीवन में कभी आराम ना मिला – राहुल रेड

जीवन में कभी आराम ना मिला मन मुताबिक कोई काम ना मिला पाने को बहुत कुछ पा लिया मगर अब भी मुझे वो मुकाम ना मिला किया था कभी आगाज जिसका उस कहानी का अंजाम ना मिला करता जो अक्सर पीठ पीछे वार वो दुश्मन मुझे सरेआम ना मिला बुला लिया हमे समय से मगर
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इंशानियत भूल जाये वो इन्शान नही चाहिए – राहुल रेड

इंशानियत भूल जाये वो इन्शान नही चाहिए हिन्दू नही चाहिए, मुसलमान नही चाहिए धर्मनिर्पेक्ष भारत को भारत ही रहने दो दंगो में सुलगता हिंदुस्तान नही चाहिए भरोसा मुझे विज्ञान के प्रमाणित विचारों पर गीता,रामायण,बाईबल कुरान नही चाहिए लोगो को लड़ाये मन्दिर मस्जिद के लिए ऐसा धर्म, मजहब, भगवान नही चाहिए विज्ञान की जरूरत है आज
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प्रदूषण से लेकर दंगो तक के कहर का – राहुल रेड

प्रदूषण से लेकर दंगो तक के कहर का फैला है जाल वहाँ धर्म जाति के जहर का देखा है बहुत भेद भाव शहर के लोगो में गाँव का देहाती हूँ पर तजुर्बा है शहर का मिलती नही कीमत अपनी ही मेहनत की किसान उगाता फसलें, पानी ले नहर का सब्जी की महँगाई चिल्लाने वाले लोगों
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बंद मुट्ठियों वाला गरीब कहाँ है – राहुल रेड

बंद मुट्ठियों वाला गरीब कहाँ है ? भूख से मरता बदनसीब कहाँ है ? आओ सब मिलकर हक़ माँगे अपना अभी हमारी मंजिल करीब कहाँ है ? बंद करो जाति धर्मो की लड़ाई भारत का युवा अदीब कहाँ है ? साम्यवाद से मुल्क के हालात न सुधरे फिर देश सुधरे वो तरकीब कहाँ है मर
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