बारिश की बूँदे -सचिन ओम गुप्ता

बारिश की बूँदे -सचिन ओम गुप्ता

बुलबुले बनाती बारिश की बूँदे मेरे आँगन में आसमान से गिरते हुए टप, टप, टप कर शोर करती, दूसरी बूँद के साथ इतरा रही थी। अपने कमरे में बैठा उन्हें देखकर मुझे एक अजीब मिट्टी की सोंधी सी महक और ख़ुशी मेरे मन के भीतर महसूस हुई… कि ये बूँदे अपने आप मे कितनी गुम
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प्रेम बनी एक कविता-सचिन ओम गुप्ता

तुम्हारा यूँ इश्क़ की गली में चले आना, नज़रों का नज़रों से यूँ टकरा जाना, तुम्हारा यूँ रूठना; हमारा मनाना, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों से कुछ कह जाना, तुम्हारा यूँ देखकर पलकों का झपकाना, तब बनती है एक कविता। रात के आगोश में लिपटे हुए तुम्हें ख़्वाबों में यूँ तकना, यूँ ही हमसे तुम्हारा
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दिल्ली मेट्रो का सफर- सचिन ओम गुप्ता

बात कुछ ऐसी है कि….. कल हम घर पे बैठे-बैठे बकयिती कर रहे थे तो अचानक से लगा कि कहीं बाहर का माहौल देखकर आते हैं, “तो हम चल दिए सज-धज के फुर्रुक बनाकर…” दिल्ली मेट्रो से… “हम नोएडा सेक्टर-15 से करोल बाग वाली मेट्रो में घुस गए” भइया हम तो थे अपनी ही धुन
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फिर तलाक क्यों? – सचिन ओम गुप्ता

“रवि ऑफिस से घर आते ही पत्नी पूजा से बोला-मुझे तलाक चाहिए.. पूजा तलाक शब्द सुनते ही रो पडी 8 साल का रिश्ता दोनों का एक 7 साल का बेटा है फिर तलाक क्यों ? रवि बोला ऑफिस मे रेखा से पिछले 6 महीने से अफेयर चल रहा हैं और हम दोनों अब शादी करना
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“हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें” – सचिन ओम गुप्ता

हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो पहली नजर में आँखों में बसी न हो.. हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो देखकर इश्क़ को शरमायी न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो ख़्वाबों में आई न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो इश्क़ की ज़ुल्फो से
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पगलिया – सचिन ओम गुप्ता

पगलियो का शारीर उनका खुद का नही होता , कहते है की उनके मस्तिस्क नही होता इसीलिए जरुरी नही की उनकी हंसी का मतलब हँसी हो या उनके रोने का मतलब जरुरी नही की रोना हो ….. पगलिया अजीब जीव होती है पर उन में औरत जात सा विरोध नही होता उन्हें अकेले पाकर शैतान
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“वो पहली मुलाकात की बात” – सचिन ओम गुप्ता

चलो एक-दूजे को भूलने की शुरुआत करतें हैं, हम अपनी पहली मुलाक़ात की बात करते हैं वो जो तुम पहली बार किताबें लिए टकरायी थी मेरे सहारे ही संभल पायी थी बस उसी पल जो हमारी नजरें टकरायी थी पगली उस वक़्त तुम बहुत घबरायी थी हड़बड़ी में बस नाम ही बता पायी थी आज
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गरीबी – सचिन ओम गुप्ता

जीवन की इस तपन को मैं रोज महसूस करता हूं, आओ आज मेरे साथ मैं तुम्हें गरीबी से मिलाकर लाता हूं| कैसा भी हो संघर्ष हम कभी पीछे हटेंगे नहीं, जैसा भी हो समय हम कभी उससे डरेंगे नहीं| दुनिया के इस रंग मंच में हमने क्या जुर्म किया, भूख से तड़पती विचारी ‘फुलवा’ को
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मेरे एहसासो के अल्फाज – सचिन ओम गुप्ता

जीवन की कहानी को नए पन्नों में लिखेंगे आज, बीते हुए कल को भूलकर कुछ नया एहसास करेंगे आज करेंगे वादा कुछ कर गुजरने का खुद से आज, इस नव वर्ष को बना लेंगे अपना सा आज। “नव वर्ष की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं”  ऐ चाँद कुछ ऐसा जतन कर दो, न आए फिर
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“सुहागरात” (मधुमायिनी) – सचिन ओम गुप्ता

उस पहली रात की बात न पूछो उस सुहागरात की बात न पूछो, मधुमायिनी की उलझन में थी मैं थोड़ी शरमायी सी थी मैं थोड़ी घबरायी सी थी मैं, उस अलबेली रात की बात न पूछो, मेरे मन की पराकाष्ठा मेरे मन में दबी रही तब तक वो अपनी कामुकता की, तस्वीर दिखाकर चले गए |
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