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कविताएँ
क्यों तुम्हारी नीर से
क्यों तुम्हारी नीर से आंख का काजल सजाऊं? क्यों तुम्हारी पीर से मैं कोई बादल बनाऊं? तुम विदा हो इसलिए हूं खड़ी इस भीड़ में, स्वप्न सुन्
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हमारे पवन पुत्र हनुमान
जिनकी शक्ति का नही लगा सकते अनुमान, वो है हमारे पवन पुत्र हनुमान। बालपन मे सूर्य देव को गए निगल, इंद्र देव ने बज्र से किया पहल। यह देख
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हम कुछ कहना चाहते हैं
हम तुम्हें लिखते है तुम पढ़ पाओगे क्या? हर जगह तुम्हारी बातें करते हैं तुम सुन पाओगे क्या? हम कुछ कहना चाहते हैं, बिन कहें तुम समझ पाओग
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हवाओं का मिज़ाज जो पहले था वही रहा
हमने चलना नही छोड़ा बढ़ना नही छोड़ा छोड़ दिये रिश्ते नाते मेले ठेले मगर पढ़ना नही छोड़ा इस सफर मे बदला बहुत कुछ मगर कुछ जस का तस रहा �
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हिंदी भाषा जाग रही है- प्रेम का भाव जगाने
बहुत हुई पश्चिम की बोली पाश्चात्य सभ्यता भाग रही है फिर से प्रेम का भाव जगाने हिंदी भाषा जाग रही है इंतजार की बेला थी आएगी इक दिन श�
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प्रेमचंद अपना-बना दिया है प्रेमचंद अपना
रहती है वह एक गांव में, रहती है वह एक गांव में, रहता है वह भी एक गांव में। घर के पास जाते हैं हम, घर के पास जाते हैं हम, उसे देख नहीं पाते ह
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तुम पूरे बदल चुके हो- तुम आजकल खुद की समझ से बाहर हो
तुम पुरे बदल चुके हो….. उससे मिलकर न तुम चुके बदल गए हो सायद ये तुम्हे भी महसूस नहीं की ये क्या होगा हर वक्त वही सकस रहता होगा ध्यान में
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सहमी धरा-वीरान सी जगह जैसे थार मरुस्थल
यह वीरान सी जगह, जैसे थार मरुस्थल।यह बिखरी ठंडी रात, जैसे थार मरुस्थल की रात ।। यह दक्षिण सड़क पर पहुंचकर रुक सा गया ।यह सड़क को देखा तो
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हम वो कागज है
हम वो कागज है। जरा सी बूंद पानी से गल जाते है। मगर कोई नाव बना दे। तो उस पार भी ,चले जाते है। हम वो कागज है। सीने पे चले कलम तो, अखबार,क�
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जब सताने लगे तुम्हें अपने
जब सताने लगे तुम्हें अपने अंतर्मन की पीड़ा ! तब मन की व्यथा को ! कविता के माध्यम से लिख देना! जब अपने ही तुमसे छल करें तुम्हें अकेला
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हरेक- ज़ेहन की चाह,
ये इश्क़- आदि-अनादि से हरेक- ज़ेहन की चाह, होती है और बेहिसाब होती है -मोती
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जिंदगी-एक ऐसी किताब है
जिंदगी- एक ऐसी किताब है, जिसके पन्नें हृदय में खुलते हैं और इसके- शब्द अनुभव से पढ़े जाते हैं -मोती
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