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Tirange ki Kasam

Dharmpal Saroj 08 Aug 2026 कहानियाँ देश-प्रेम Bharat Man ke liye ek Sundar kahani, Bharat mata ki Jay, ek Sundar Rachna Desh Prem ke liye, 15 August emotional kahani 296 1 5 Hindi :: हिंदी

तिरंगे की आख़िरी कसम

उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव सूरजपुर में सुबह की पहली किरण जब खेतों पर पड़ती थी, तो ऐसा लगता था जैसे धरती ने हरे रंग की चादर ओढ़ रखी हो। गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे पत्थर की बनी एक छोटी-सी चौकी थी।

उस चौकी पर हर साल 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाता था।

गाँव में रहने वाला सत्तर साल का रघुनाथ हर स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले चौकी साफ करता, उसके चारों ओर मिट्टी बुहारता और फिर बड़े सम्मान से तिरंगे के लिए जगह तैयार करता।

लोग अक्सर उससे कहते—

“रघुनाथ काका, अब आपकी उम्र हो गई है। यह काम किसी जवान को करने दीजिए।”

रघुनाथ मुस्कुराकर जवाब देता—

“बेटा, जवान तो बहुत काम कर सकते हैं, लेकिन तिरंगे की सेवा करने के लिए उम्र नहीं, दिल चाहिए।”

गाँव के बच्चों को उसकी यह बात बहुत अच्छी लगती थी।

उन्हीं बच्चों में एक दस साल का लड़का अमन भी था।

अमन की आँखों में हमेशा एक सपना रहता था।

वह बड़ा होकर सैनिक बनना चाहता था।

जब भी गाँव में सेना की वर्दी पहने कोई जवान आता, अमन उसके पीछे-पीछे घूमता रहता।

एक दिन उसने रघुनाथ से पूछा—

“काका, सैनिक देश के लिए जान क्यों देते हैं?”

रघुनाथ कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने पीपल के पेड़ की ओर देखते हुए कहा—

“क्योंकि बेटा, सैनिक सिर्फ जमीन की रक्षा नहीं करता। वह उन लोगों के सपनों की रक्षा करता है जो उस जमीन पर अपना घर बनाते हैं।”

अमन ने पूछा—

“और देश क्या होता है?”

रघुनाथ ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा।

“देश सिर्फ नक्शे पर बनी एक सीमा नहीं है। देश वह माँ है जिसके आँगन में हम पैदा होते हैं। वह खेत है जिसमें किसान पसीना बहाता है। वह स्कूल है जहाँ बच्चा अपना पहला अक्षर सीखता है। वह नदी है जो प्यासे को पानी देती है। और सबसे बढ़कर—देश उन करोड़ों लोगों का विश्वास है कि हम सब मिलकर एक-दूसरे के लिए खड़े रहेंगे।”

अमन चुपचाप सुनता रहा।

उस दिन से तिरंगा उसके लिए सिर्फ तीन रंगों का कपड़ा नहीं रहा।

वह उसके लिए एक सपना बन गया।

समय गुजरता गया।

अमन बड़ा होने लगा।

उसके पिता किसान थे। घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। कभी फसल अच्छी होती तो घर में खुशियाँ आतीं, और कभी बारिश धोखा दे जाती तो पूरे परिवार को अगले मौसम का इंतजार करना पड़ता।

अमन की माँ सावित्री सिलाई करके घर का खर्च चलाने में पति की मदद करती थी।

एक शाम अमन खेत से लौटकर माँ के पास बैठा।

“माँ, मैंने तय कर लिया है।”

सावित्री ने सिलाई रोककर पूछा—

“क्या तय कर लिया?”

“मैं सेना में जाऊँगा।”

सावित्री कुछ पल बेटे को देखती रही।

उसकी आँखों में गर्व भी था और चिंता भी।

उसने धीरे से कहा—

“देश की सेवा करना अच्छी बात है बेटा, लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है।”

अमन बोला—

“मुझे पता है माँ।”

“वहाँ अनुशासन होगा।”

“मैं निभाऊँगा।”

“मुश्किलें होंगी।”

“सहन करूँगा।”

“घर से दूर रहना पड़ेगा।”

अमन ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“माँ, अगर मेरा घर सिर्फ यह छोटा-सा मकान है तो मैं इसे छोड़कर जा सकता हूँ। लेकिन अगर मेरा घर पूरा देश है, तो मैं उसे छोड़कर कहाँ जाऊँगा?”

सावित्री की आँखें भर आईं।

उसने बेटे को गले लगा लिया।

“जा बेटा। लेकिन एक बात याद रखना।”

“क्या?”

“वर्दी पहनना आसान है, उस वर्दी की इज्जत बचाना मुश्किल। कभी ऐसा काम मत करना जिससे तिरंगे का सिर झुक जाए।”

अमन ने माँ के सामने हाथ जोड़कर कहा—

“मैं वादा करता हूँ।”

कुछ वर्षों बाद अमन सेना में भर्ती हो गया।

जब वह पहली बार वर्दी पहनकर गाँव आया, तो पूरा सूरजपुर उसे देखने उमड़ पड़ा।

रघुनाथ की आँखों में चमक थी।

उसने अमन को देखकर कहा—

“आज तू सच में बड़ा हो गया बेटा।”

अमन ने उसके पैर छुए।

“काका, आपकी बातें याद थीं।”

“कौन-सी?”

“देश जमीन नहीं, विश्वास है।”

रघुनाथ की आँखें नम हो गईं।

“बस उस विश्वास को कभी टूटने मत देना।”

अमन कुछ दिनों की छुट्टी के बाद वापस चला गया।

अब उसके घर में उसकी तस्वीर लगी थी।

सावित्री रोज उस तस्वीर के सामने दीपक जलाती।

कभी-कभी पड़ोस की औरतें पूछतीं—

“बहन, इतना याद करती हो?”

सावित्री मुस्कुराकर कहती—

“माँ हूँ। याद तो आएगा ही। लेकिन मेरा बेटा सिर्फ मेरा नहीं है। उसने देश की वर्दी पहनी है।”

एक साल बाद 15 अगस्त आने वाला था।

सूरजपुर में तैयारी शुरू हो गई।

स्कूल में बच्चे देशभक्ति के गीतों की तैयारी करने लगे।

गाँव के प्रधान ने घोषणा की—

“इस बार स्वतंत्रता दिवस पर हमारे गाँव का बेटा अमन सिंह मुख्य अतिथि होगा।”

यह खबर सुनकर पूरे गाँव में खुशी फैल गई।

अमन ने फोन पर माँ से कहा—

“माँ, अगर छुट्टी मिली तो इस बार 15 अगस्त तुम्हारे साथ मनाऊँगा।”

सावित्री हँस पड़ी।

“मैंने तेरे लिए तेरी पसंद की खीर बनाने की तैयारी शुरू कर दी है।”

“सच?”

“हाँ।”

“और काका?”

“वह तो तिरंगा पहले ही निकालकर रख चुके हैं।”

अमन बोला—

“माँ, इस बार मैं खुद तिरंगा फहराऊँगा।”

सावित्री ने कहा—

“ठीक है बेटा। मैं इंतजार करूँगी।”

लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी बनाई हुई तारीखों के हिसाब से नहीं चलती।

15 अगस्त से तीन दिन पहले अमन की यूनिट को अचानक सीमा क्षेत्र में एक जरूरी अभियान के लिए भेज दिया गया।

फोन पर अमन ने माँ से कहा—

“माँ, शायद मैं इस बार गाँव नहीं आ पाऊँगा।”

कुछ पल के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई।

फिर सावित्री ने सामान्य आवाज में कहा—

“कोई बात नहीं बेटा। देश पहले है।”

“माँ…”

“तू चिंता मत कर। मैं तेरे हिस्से का तिरंगा भी फहरा दूँगी।”

“और खीर?”

सावित्री हँस पड़ी।

“वह भी बचाकर रखूँगी।”

अमन बोला—

“पक्का?”

“पक्का।”

फोन कट गया।

उस रात सावित्री देर तक सो नहीं पाई।

उसने बेटे की पुरानी तस्वीर उठाई और उसके माथे को चूमते हुए बोली—

“भगवान, मेरे बेटे को सुरक्षित रखना।”

उधर सीमा पर अमन अपने साथियों के साथ तैनात था।

15 अगस्त की सुबह से पहले ही उन्हें एक कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा।

इलाके में मौसम खराब था।

बारिश लगातार हो रही थी।

सैनिकों के पास आराम करने का समय नहीं था।

एक साथी ने अमन से पूछा—

“यार, आज 15 अगस्त है।”

अमन मुस्कुराया।

“हाँ।”

“घर की याद आ रही है?”

“बहुत।”

“तुम्हारी माँ क्या करती होंगी?”

अमन ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा—

“शायद मेरे लिए खीर बना रही होंगी।”

सब हँस पड़े।

फिर अमन ने जेब से एक छोटा-सा तिरंगा निकाला।

उसने उसे सावधानी से सीधा किया।

साथी ने पूछा—

“इसे हमेशा साथ रखते हो?”

अमन ने कहा—

“हाँ। जब घर दूर लगे, तो यह छोटा-सा तिरंगा मुझे याद दिलाता है कि मेरा घर बहुत बड़ा है।”

उसी समय उन्हें आगे बढ़ने का आदेश मिला।

अमन और उसके साथी अपनी जिम्मेदारी निभाने निकल पड़े।

घंटों की कठिन ड्यूटी के बाद आखिरकार स्थिति नियंत्रण में आई।

अमन ने राहत की साँस ली।

उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला।

नेटवर्क बहुत कमजोर था।

कई कोशिशों के बाद माँ का नंबर लगा।

“हैलो माँ?”

सावित्री की आवाज आई—

“अमन!”

“माँ, 15 अगस्त मुबारक।”

“तुझे भी बेटा।”

“तिरंगा फहराया?”

“अभी नहीं। तेरे आने का इंतजार कर रही हूँ।”

अमन कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“माँ, इस बार तुम ही फहरा देना।”

सावित्री की आवाज भर्रा गई।

“ठीक है।”

“और काका से कहना कि मैं जल्दी आऊँगा।”

“जरूर।”

“माँ…”

“हाँ?”

“मैंने आपसे जो वादा किया था, याद है?”

“कौन सा?”

“कि तिरंगे का सिर कभी झुकने नहीं दूँगा।”

सावित्री ने आँखें बंद कर लीं।

“याद है बेटा।”

“उसे निभाना है माँ।”

“हाँ।”

फोन कट गया।

अगली सुबह सूरजपुर में 15 अगस्त का कार्यक्रम शुरू हुआ।

बच्चे सफेद कपड़ों में आए थे।

किसी के हाथ में कागज का तिरंगा था, किसी के चेहरे पर तीन रंगों की छोटी-सी पेंटिंग।

रघुनाथ ने चौकी साफ की।

सावित्री भी वहाँ पहुँची।

उसने साधारण-सी साड़ी पहन रखी थी।

लोग उसे देखकर चुप हो गए।

प्रधान ने कहा—

“बहन, आज तिरंगा आप फहराइए।”

सावित्री ने तिरंगे की रस्सी पकड़ी।

उसकी आँखें बार-बार रास्ते की ओर जा रही थीं।

जैसे उसे उम्मीद हो कि अमन अचानक सामने से दौड़ता हुआ आ जाएगा।

रघुनाथ उसके पास आया।

“बेटी, आज तू ही अमन है।”

सावित्री ने उसकी तरफ देखा।

“मैं?”

“हाँ। क्योंकि आज तेरे हाथ में सिर्फ रस्सी नहीं है। तेरे बेटे का विश्वास है।”

सावित्री ने गहरी साँस ली।

उसने रस्सी खींची।

तिरंगा आसमान में लहराने लगा।

पूरा गाँव एक साथ राष्ट्रगान के लिए खड़ा हो गया।

सावित्री की आँखों से आँसू बह रहे थे।

लेकिन उसके चेहरे पर गर्व था।

राष्ट्रगान के बाद बच्चों ने तालियाँ बजाईं।

तभी गाँव के स्कूल का प्रधानाचार्य मंच पर आया।

उसके हाथ में एक लिफाफा था।

उसने सावित्री की ओर देखा।

“बहन… यह आपके लिए है।”

सावित्री ने काँपते हाथों से लिफाफा लिया।

लिफाफे पर अमन का नाम था।

उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“यह क्या है?”

प्रधानाचार्य ने कुछ नहीं कहा।

सावित्री ने काँपते हाथों से पत्र खोला।

पत्र में लिखा था—

“माँ,

अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में है तो शायद मैं तुम्हारे पास लौटकर नहीं आ पाया।

लेकिन माँ, रोना मत।

तुमने मुझे सिखाया था कि देश की रक्षा करना सिर्फ सीमा पर खड़े होना नहीं है।

आज मुझे समझ आया कि देश की रक्षा उन सपनों की रक्षा करना भी है जिन्हें हमारे बच्चों ने आँखों में सजाया है।

अगर मैं वापस नहीं आ सका तो मेरी एक इच्छा है।

मेरे गाँव का कोई बच्चा पढ़ाई पैसों के कारण न छोड़े।

मेरी बची हुई तनख्वाह और जो भी सहायता मिले, उससे गाँव में बच्चों के लिए एक छोटी-सी पुस्तकालय बनवा देना।

उसका नाम रखना—

‘तिरंगा पुस्तकालय।’

माँ, जब कोई बच्चा वहाँ किताब खोलकर पढ़ेगा, तो समझना मैं वहीं हूँ।

और हाँ…

15 अगस्त को जब तिरंगा लहराए तो मुझे मत ढूँढना।

मैं वहीं मिलूँगा।

तिरंगे के नीचे।

तुम्हारा बेटा,
अमन।”

पत्र पढ़ते-पढ़ते सावित्री की आँखों से आँसू गिरने लगे।

पूरा गाँव शांत था।

रघुनाथ ने अपना सिर झुका लिया।

कुछ बच्चे रोने लगे।

प्रधानाचार्य ने बताया कि सीमा पर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अमन ने अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित की थी, लेकिन वह वापस नहीं लौट सका।

सावित्री ने आँसू पोंछे।

फिर वह मंच पर खड़ी हुई।

उसने पूरे गाँव की ओर देखा।

“आज मेरा बेटा मेरे साथ नहीं है।”

कुछ क्षण वह रुकी।

“लेकिन उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।”

लोग उसकी ओर देखने लगे।

“उसने मुझे पूरा देश दे दिया है।”

फिर उसने अमन का पत्र उठाया।

“उसकी आखिरी इच्छा थी कि हमारे गाँव का कोई बच्चा पैसों के कारण पढ़ाई न छोड़े।”

रघुनाथ आगे आया।

“यह इच्छा पूरी होगी।”

प्रधान ने कहा—

“गाँव भी साथ देगा।”

एक किसान बोला—

“मैं अपनी एक महीने की फसल का कुछ हिस्सा दूँगा।”

दुकानदार ने कहा—

“मैं किताबें मुफ्त दूँगा।”

स्कूल के शिक्षक ने कहा—

“मैं शाम को बच्चों को मुफ्त पढ़ाऊँगा।”

धीरे-धीरे पूरा गाँव आगे आने लगा।

उस दिन सूरजपुर ने सिर्फ स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया।

उस दिन पूरे गाँव ने एक सैनिक के सपने को अपना सपना बना लिया।

कुछ महीनों बाद पीपल के पेड़ के पास एक छोटी-सी इमारत खड़ी थी।

उसके बाहर एक पट्टिका लगी थी—

“तिरंगा पुस्तकालय
शहीद अमन सिंह की स्मृति में”

हर शाम गाँव के बच्चे वहाँ पढ़ने आते।

दीवार पर अमन की तस्वीर लगी थी।

उस तस्वीर के नीचे लिखा था—

“देश से प्रेम केवल सीमा पर नहीं, अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने में भी है।”

एक दिन वही दस साल का अमन वाला सपना देखने वाला बच्चा नहीं, बल्कि अब बड़ा हो चुका एक युवक पुस्तकालय में बैठा बच्चों को पढ़ा रहा था।

उसका नाम था राहुल।

राहुल ने एक बच्चे से पूछा—

“बड़े होकर क्या बनोगे?”

बच्चे ने कहा—

“सैनिक।”

राहुल मुस्कुराया।

“क्यों?”

बच्चे ने दीवार पर अमन की तस्वीर की ओर देखकर कहा—

“क्योंकि मैं भी तिरंगे की रक्षा करना चाहता हूँ।”

उसी समय बाहर से सावित्री की आवाज आई—

“बेटा, पढ़ाई पूरी कर लेना। देश की सेवा करने के बहुत रास्ते होते हैं।”

राहुल बाहर आया।

सावित्री हाथ में पौधा लिए खड़ी थी।

“यह क्या है माँ?”

“अमन के नाम का पौधा।”

दोनों ने पुस्तकालय के सामने वह पौधा लगाया।

रघुनाथ भी वहाँ आ गया।

उसने मिट्टी पर हाथ रखा और कहा—

“देखो, अमन फिर लौट आया।”

राहुल ने पूछा—

“काका, कहाँ?”

रघुनाथ ने आसमान की ओर देखा।

“जहाँ भी कोई बच्चा देश के लिए कुछ अच्छा करने का सपना देखता है, वहाँ अमन मौजूद है।”

हवा चली।

पीपल के पत्ते हिले।

और पुस्तकालय के ऊपर लगा तिरंगा हवा में लहराने लगा।

उस दिन शाम को सावित्री बहुत देर तक तिरंगे को देखती रही।

उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

सिर्फ गर्व था।

उसे अब समझ आ गया था कि उसका बेटा उससे दूर नहीं गया।

उसने अपने जीवन को एक ऐसी कहानी में बदल दिया था जिसे आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ेंगी।

एक ऐसी कहानी जिसमें कोई बड़ा महल नहीं था।

कोई दौलत नहीं थी।

कोई प्रसिद्धि नहीं थी।

बस एक माँ थी।

एक बेटा था।

एक गाँव था।

और एक तिरंगा था।

वह तिरंगा, जिसके तीन रंग हर किसी को अलग-अलग संदेश देते हैं—

केसरिया हमें साहस देता है।

सफेद हमें शांति और सच्चाई की याद दिलाता है।

हरा हमें धरती, जीवन और विकास से जोड़ता है।

और बीच का अशोक चक्र हमें बताता है—

रुकना नहीं है।

देश भी चलता रहे।

लोग भी आगे बढ़ते रहें।

सपने भी जीवित रहें।

कहानी के कई साल बाद सूरजपुर का वह छोटा-सा पुस्तकालय बड़ा हो चुका था।

वहाँ अब सैकड़ों बच्चे पढ़ते थे।

कुछ डॉक्टर बने।

कुछ शिक्षक।

कुछ इंजीनियर।

कुछ किसान बनकर अपने गाँव लौटे।

और हर साल 15 अगस्त को सभी बच्चे पुस्तकालय के सामने इकट्ठा होते।

तिरंगा फहराया जाता।

राष्ट्रगान होता।

फिर सावित्री बच्चों से सिर्फ एक बात कहती—

“बच्चो, देश से प्रेम करने के लिए आपको सैनिक बनना जरूरी नहीं है।”

बच्चे ध्यान से सुनते।

वह कहती—

“ईमानदारी से पढ़ना भी देश सेवा है।

किसी भूखे को खाना खिलाना भी देश सेवा है।

पेड़ लगाना भी देश सेवा है।

किसी कमजोर की मदद करना भी देश सेवा है।

अपना काम पूरी ईमानदारी से करना भी देश सेवा है।

और सबसे बड़ी देश सेवा है—

जब देश आपसे कुछ माँगे, तब अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के बारे में सोचना।”

बच्चे तालियाँ बजाते।

फिर वह तिरंगे की ओर देखकर धीरे से कहती—

“मेरे बेटे ने देश के लिए अपना जीवन दिया था। तुम सब अपने जीवन को देश के लिए अच्छा बनाना।”

हर साल यह बात बच्चों के दिल में उतरती गई।

और एक दिन सूरजपुर के स्कूल की दीवार पर बड़े अक्षरों में लिखा गया—

“शहीद केवल वह नहीं जो देश के लिए मरता है,
सच्चा देशभक्त वह भी है जो देश को बेहतर बनाने के लिए हर दिन जीता है।”

15 अगस्त की सुबह फिर आई।

सूरज निकला।

खेतों पर ओस चमकी।

पीपल के पत्ते हवा में झूमे।

तिरंगा आसमान में लहराया।

सावित्री ने अपनी आँखें बंद कीं।

उसे लगा जैसे किसी ने बहुत धीरे से कहा—

“माँ…”

उसने आँखें खोलीं।

सामने सैकड़ों बच्चे खड़े थे।

सबके हाथों में छोटे-छोटे तिरंगे थे।

सावित्री मुस्कुराई।

उसने आसमान की ओर देखा और कहा—

“अमन, तेरी कसम आज भी जिंदा है।”

तिरंगा हवा में और ऊँचा उठ गया।

और उस दिन सूरजपुर के लोगों ने जाना—

देश सिर्फ वह नहीं जिसके लिए कोई अपनी जान दे देता है।
देश वह भी है जिसके लिए करोड़ों लोग अपनी जिंदगी ईमानदारी से जीते हैं।

यही भारत है।

यही आजादी है।

और यही तिरंगे की आखिरी कसम है—

“जब तक इस मिट्टी में एक भी इंसान अपने देश के लिए अच्छा करने का सपना देखता रहेगा, तब तक भारत की आजादी की कहानी कभी खत्म नहीं होगी।”

जय हिंद।
वंदे मातरम्।

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Laxmi Kumari
Laxmi Kumari माता - पिता ही भगवान है 🙏🙏🙏

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