Santosh kumar koli ' अकेला' 01 Jun 2025 कविताएँ समाजिक प्रजातंत्र में भीड़ 2871 0 Hindi :: हिंदी
सत्य, न्याय, नियम, भीड़ बाढ़ में बह जाते हैं। वही सत्य समझ जाता, जो मूढ़ मुंड कह जाते हैं। भीड़ के रेले से, संहत शजर ढह जाते हैं। भीड़ के भूकंप से, तख़्तोताज धरे रह जाते हैं। भीड़ में शक्ल नहीं, सर गिने जाते हैं। भीड़, भाड़ में, गीले, सूखे सब भूने जाते हैं। जुमलों, जब़ानी हमलों से, स्वार्थ जाल बुने जाते हैं। भीड़ के बल से, राजा हटाए, चुने जाते हैं। भीड़ का न रूप- रंग, न शान -शकल होती है। भीड़ निज विचारों की छीड़, सोच पर साँकल होती है। भीड़ होती अंधभक्त, तर्क, तत्थों में दख़ल होती है। हर परिणाम को पलटने की, अटल अटकल होती है। भीड़ उसी की, जो भीड़ नब्ज़ पढ़ सकता है। भीड़ गुल्म का, जो मज़मून गढ़ सकता है। भीड़ भीत की भीत को, प्यादों, वादों से जकड़ सकता है। वही वैचारिक नेता, भीड़तंत्र में आगे बढ़ सकता है।