Santosh kumar koli ' अकेला' 29 Jul 2024 कविताएँ समाजिक बरसाती रंग 9285 0 Hindi :: हिंदी
तुंग श्रृंग पर गिरे, निरंक बादल बगुले से। फाहे से धवल, निखरे- निखरे धुले -धुले से। दुग्ध फेन में, उठते- गिरते बुलबुले से। उबले हुए से चावल, बिन मांड के खुले -खुले से। झर, झर- झर झर रहे, समाॅं हुई खा़मोश। मेघ ने मही नायिका को, ले लिया आगोश। पक्षी मस्ती से कुरियाल रहे, फुदकने की सोच रहा, झाड़ी से ख़रगोश। परनाले अभी थमे नहीं, थमा खरर- खरर का जोश। काली, नीली चुनरी पर, सतरंगी आभा छाई। पुनः रास्ता पकड़ रहे, ठहरे हुए राही। अंबुद, अंबर की धरती पर, दीख रही परछाईं। शीकर से रश्मि झाॅंक रही, चरिंदे ले रहे अंगड़ाई।