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जमीर विक्रीत

Santosh kumar koli ' अकेला' 02 Feb 2025 कविताएँ समाजिक जमीर विक्रीत 5147 0 Hindi :: हिंदी

जानता पर नहीं मानता, 
आंँख बांँध पट्टी। 
स्वार्थ रोटी सेंकता, 
सांँच आंँच भट्टी। 
मिट्टी गिरा शहद चाटता, 
शहद से ज्यादा मिट्टी। 
सत्य पेट पचता नहीं, 
गैस, डकार, उल्टी। 
सत्य, 
 गले में ही अटक गया। 
तो समझो, वह बिक गया। 

बोलता नहीं, 
जो भोंकता है। 
साँच सब्ज़ी को, 
झूठ से छौंकता है। 
एक ही झूठ को, 
नए-नए रूप में परोसता है। 
 झूठ को सांँच सिद्ध करने, 
ज़ोर -ज़ोर से धौंकता है। 
जिसको सत्य परे का, 
स्वार्थ दिख गया। 
तो समझो, वह बिक गया। 

गोल -गोल घुमा, 
बात की चूड़ी देता मार। 
कहे क्या, सुने क्या, 
मूल व्याधि दरकिनार

एक कुत्ता चक्की चाटे, 
दूजा उस कुत्ते को चाटे, कैसा सार? 
चक्रवृद्धि से चुकेगा, 
बुराई जो ली उधार। 
न दया न हया, 
चक्रगति से भटक गया। 
तो समझो, वह बिक गया। 
तो समझो, वह बिक गया।

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