Santosh kumar koli ' अकेला' 01 Feb 2026 कविताएँ समाजिक जज़्बे की जीत 1866 0 Hindi :: हिंदी
आती है तो आने दो, आना उनका काम। कसकर बांँध लो मुट्ठी में, क़दम लहरों के वाम। बन लहरी लहरों को, अपने कर लो नाम। हारा कहलाए बेचारा, चल वाम, करे सलाम अवाम। कितना ही तीक्ष्ण, भीष्ण हो, तूफ़ानों से मिलाओ आंँख। जीत की ज़िद करो, लगाओ हौसलों की पाँख। नियति के नज़ारे को, रोमांच झांँके से झांँक। छाती पर झंडा गाड़, दे प्रबल, सलीम हाँक। सफ़र में होगा सामना, सैलाबों पर करो वार। निमिषांतर में हार हारेगी, जीत की होगी जयकार। खुद का जीवन खुद जियो, खुद के हाथ खुद की पतवार। मल्लाह, मांँझी की आस छोड़ो, तैरकर दरिया करो पार।