Ankit kahar 24 Aug 2026 कविताएँ समाजिक #kalyug#samaj#generation#apradhi#kavita#hindikavita#Ankitkahar 1205 0 Hindi :: हिंदी
कलयुग का अपराधी मैं अपने पापो का अघाती हूं, मैं सिर्फ तेरे सुख में तेरा साथी हूं, हा मैं जानवरो को काटके खता हु, मैं ही तो कलयुग का अपराधी हूँ, ।।२ अब पैसो की मोह में मुझे अपनों का कोई मोल नहीं, अपनी पत्नी होते हुए भी ये दिल डोल रहा है ओर कहीं, मैं नोच खाता हूं उस शरीर को जो नारी शक्ति की शान है, कैसे बचा पाओगे तुम उनको जो देवी सी महान है, अपवित्र है अब वह धरती भी जो आदिसृजन की मान है, अब मैं ही इस युग में अंधक सा आघाती हूँ, हा मैं ही इस कलयुग का अपराधी हूं, ।।२ ममता के खुशियों को छीना, एक पिता का सपना तोड़ दिया, बस दो पल की प्यार के खातिर अपने ही परिवार से मुँह को मोड़ लिया, इतना क्रूर था मुझमें एक बहना का हक्क भी छीन लिया, मार दिया मैंने उसके प्यारे सपनों को, मैंने भाई-बहन के रिश्ते को इस पृथ्वी से विहीन किया, हा मैं ही वह नर हूँ जो एक नर के राह का बाधी हूँ, तभी तो मैं इस कलयुग का अपराधी हूं, ।।२ अपने जीवन छैयां को मैं कभी बदल ना पाता हूँ, इसलिये तो मैं दिन प्रतिदिन पतझड़ में बिखर सा जाता हूँ, मैं पूर्वार्ध का एक मौसम था, अब उत्तरार्ध के मेलेपन सावन हूं, जहां पहिले मंदिर को पूजा जाता था, मैं उसी स्वर्ग का अहिरावण हूं, हा मैं अहंकार सा तुच अपराध करु, इसलिए मैं कलयुग का अपराधी हूँ, हा हा मैं ही तो हूँ जो इस कलयुग का अपराधी हूँ ||२