Santosh kumar koli ' अकेला' 31 Mar 2024 कविताएँ समाजिक क़लम की तासीर 7677 0 Hindi :: हिंदी
क़लम डांटती, डपटती, कांपती है। तर्जन- गर्जन, मान मर्दन, हांफती है। भावों की दूरी, मजबूरी, शब्दों से नापती है। दुनिया का अक्षत अक्स, पन्ने पर छापती है। दफ़न दर्द को, जुबान पर ला ही देती है। दिल के आंसू, आंखों से बहा ही देती है। क़लम नोक करवीर को, झुका ही देती है। नौज, क़लम की मार, अच्छों- अच्छों को, रुला ही देती है। क़लम सर क़लम करती नहीं, सर फेरती है। बादशाह, फ़क़ीर के फ़र्क़ को, शब्दों से पेरती है। सृजन, संहार, परिवर्तन को, क़लम ही उकेरती है। क़लम जब चलती है, ब्रह्मांड, युगों को घेरती है