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दुखी आत्मा

Santosh kumar koli ' अकेला' 15 Mar 2026 कविताएँ समाजिक दुखी आत्मा 3070 0 Hindi :: हिंदी

जिसकी, जिससे तृप्त, 
स्वार्थ- पिपासा। 
वही रीति,नीति, 
चाहे दीगर लासा। 
चाहे कर तमाशा, 
पर मेरे मुंँह बताशा। 
तेरे मेरे अंतर्मन की, 
एक ही भाषा। 
मैं क्यों बोलूँ, 
तुला मेरा हित तौलती है? 
क्योंकि, 
दुखी आत्मा बोलती है। 

स्वार्थ सधे, अवगुण तजे, 
दिखते गुण ही गुण। 
स्वार्थ तजे, अवगुण दिखे, 
गिन- गिन, चुन -चुन। 
चलते हाथ थाम, चले वाम, 
बदला राग धुन। 
धूमक- धैया बनते पाखिया, 
हल्का करते मन। 
खाते चुरना, 
पेट मरोड़ उठती है। 
क्योंकि, 
दुखी आत्मा बोलती है। 

परस्थ परापेक्षित, 
आती खुनस की बू। 
स्वार्थ सधे आप -आप, 
स्वार्थ तजे आप से तू। 
स्वार्थ तजे बने काग, 
स्वार्थ सधे बने घुग्घू। 
मतलब की है न्याय, 
वरना न्याय जलो धू-धू। 
स्वार्थ न्याय पास से, 
धारा डग-मग डोलती है। 
क्योंकि, 
दुखी आत्मा बोलती है।

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