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परिंदा-परिंदों को देखो कहां ठहरता है जहां मन उसका
परिंदों को देखो कहां ठहरता है जहां मन उसका वहीं उड़ता है ऐ मन भी हमारा परिंदा है जानम इसे रोकना कहां हमारे हाथों में होता है धन्य�
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छोड़ दिया- तेरी फिक्र करना छोड़ दिया
लो तेरी फिक्र करना छोड़ दिया तेरे आने जाने से अब फर्क नहीं पड़ता लो हमने तेरा इंतजार करना छोड़ दिया जब तुम्हें परवाह नहीं मेरी तो हमन�
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मेरे दिलकी गहराई में-तेरी यादें समाई रहती है
मेरे दिलकी गहराई में, तेरी यादें समाई रहती है जिन्दा तो हूं मगर, तेरे बिना यहां मेरी लासो सा जिस्म परी रहती है
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मेरा कसूर क्या था-दिल लगाने की गुनाह कर ली
मेरा कसूर क्या था बस इतना कि तुझसे दिल लगाने की गुनाह कर ली आखियों में आंसू भर आया मेरा जब - जब दिल ने तुझे याद करने की भूल कर ली दिल ना�
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भुला देगें अब हम तेरे प्यार को-जा तुझे आजाद किया
भुला देगें अब हम तेरे प्यार को जा तुझे आजाद किया याद करेगा तू भी मेरी वफ़ा को कितना दर्द मिला है तेरी मोहब्बत से जो सुकून था वो भी छीन�
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नादानी-मेरी नादानी को नासमझी मत समझ
मेरी नादानी को नासमझी मत समझ प्यार करती हूं तुझसे इसलिए हर बार तेरे बातों में आ जाती हूं मेरी बेकूफी को कमजोरी मत समझ क्योंकि अगर मैं
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घर से निकल आए- घर के लिए पैसे कमाने
घर से निकल आए घर के लिए पैसे कमाने। कई रूप देखे कई सवाल यहां के जमाने। परिश्रम रंग लाया पाया मैंने यहां सबकुछ _ हरेक रत्नों से भरा है आ�
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गाल तुम्हारे रसगुल्ला से कम तो नहीं-हरेक अंग किसी अप्सरा से कम तो नहीं
गाल तुम्हारे रसगुल्ला से कम तो नहीं। हरेक अंग किसी अप्सरा से कम तो नहीं। जिसके आने से नहीं होता है अँधेरा_ तुम तो यार सूर्य की किरण से �
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आईने की तुझे जरुरत नहीं-तुम खुद एक आइना हो
आईने की तुझे जरुरत नहीं तुम खुद एक आइना हो। शीशे जैसा चमकता तेरा बदन तुम एक मृदु हसीना हो। देखने के बाद लोग खुदबखुद चार्ज होने लगता है_
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हरी चुनरिया ओढ़कर-धरती लगती खूब
हरी चुनरिया ओढ़कर,धरती लगती खूब। सावन जल बरसे अभी,चमक रही है दूब। काले बादल मस्त है,वसुंधरा है मग्न_ जो देती है अति खुशी,चाह सभी मंसूब।
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क्या हो गया आज लोगों को- बात बात में लड़ जाते हैं
(मुक्तक छंद) क्या हो गया आज लोगों को बात _बात में लड़ जाते हैं। ईर्ष्या की आग में जलकर लोग स्वयं भस्म हो जाते हैं। खुद मत जलें भाइयों इस �
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कब समर्पित कर तुम्हें -कुछ पाऊंगी मैं
कब यह नेत्र आंसुओं से रिक्त होंगे क्या ह्रदय खुलकर कभी हंस पाऊंगी मैं। यह सृजन क्षण में नहीं होगा कभी मांगू अगर आकाश तो बादल ही पाऊंग�
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