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कविता संग्रह 1 बिछड़न......... जब अगले साल यही वक़्त आ रहा होगा... ये कौन जानता है कौन किस जगह होगा... तू मेरे सामने बैठा है और मैं सोचता ह� read more >>
किसने जाना कि कल है क्या होगा कुरबतें या के फ़ासला होगा आज रोया है वो तो रोने दो हो न हो ख़ुद से वो मिला होगा चांद जो पल में बन गया मिट् read more >>
एक बड़ी शहर में एक परिवार रहता था जिसमें दो बच्चे और उनके माता-पिता थे। परिवार के सदस्य एक-दूसरे से प्यार करते थे और हमेशा खुश रहने का प� read more >>
हँसने का हँसाने का हुनर ढूंढ रहे हैं हम लोग दुआओं में असर ढूंढ रहे हैं अब कोई हमें ठीक-ठिकाने तो लगाए घर में हैं मगर अपना ही घर ढूंढ रह� read more >>
ज़िन्दगी के फलसफ़े में अब न उलझाना मुझे ख़ुद समझ लेना तो उसके बाद समझाना मुझे मेरी दिन भर की उदासी को समझ लेता है वो शाम होते ही बुला लेता read more >>
डूबते वक्त क़िसी का तो सहारा होता कोई तिनका, कोई कश्ती या किनारा होता क्यों पसोपेश में रहते कि किधर जायें हम तेरी जानिब से अगर कोई इशा� read more >>
ख़ुद को ग़म से छुड़ा लो ज़रा एक दीपक जला लो ज़रा रात काली अमावस हुई अपनी पलकें उठा लो ज़रा हर क़दम पे सजे आशियाँ पाँव अपने सम्भालो ज़रा दोस्� read more >>
ख़ुद को ग़म से छुड़ा लो ज़रा एक दीपक जला लो ज़रा रात काली अमावस हुई अपनी पलकें उठा लो ज़रा हर क़दम पे सजे आशियाँ पाँव अपने सम्भालो ज़रा दोस्� read more >>
ख़ुद को ग़म से छुड़ा लो ज़रा एक दीपक जला लो ज़रा रात काली अमावस हुई अपनी पलकें उठा लो ज़रा हर क़दम पे सजे आशियाँ पाँव अपने सम्भालो ज़रा दोस्� read more >>
दुनिया की लिये ख़ैर-ख़बर डूब रहा है तय कर लिया सूरज ने सफ़र डूब रहा है हम मंदिरो-मस्जिद को बचाने में लगे हैं घर की है नहीं फ़िक्र कि घर डूब र read more >>
अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा आसूदगी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रह� read more >>
*मेरी डायरी* सरिता के विवाह की तैयारी जोरो - शोरों से चल रही थी... मेहमान आ गये थे... घर में बहुत रौनक थी... पर पिताजी का तो दिल बैठा जा रहा था read more >>
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