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रहूं या न रहूं
मैं रहूं या न रहूं मेरी यादें साथ रहेगी खुश रहना तू जिदंगी में बस इतनी दुआ रहेगी । धन्यवाद
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लोगों के आंखों में
सच बोलती हूं इसलिए लोगों के आंखों में खलती हूं नहीं तो आज वही आंखे मुझे अपने सर आंखों पर विराजमान रखती। धन्यवाद
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सच और झूठ
सच और झूठ बोलने में बस इतना ही फर्क है झूठ बोलने वालों की वहा वाही और सच बोलने वालों की तबाही। धन्यवाद
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अच्छा लगता है
बार - बार वहां सर झुकाने में अच्छा लगता है जहां तुम्हारी भी कदर हो ,वहां नहीं जहां तुम्हारी कोई इज्जत ही नहीं। धन्यवाद
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अपमान
सच बोलने वाले लोगों की कदर नहीं होती उसे हर कदम पर अपमान का घूंट पीना पड़ता है । धन्यवाद
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छुपाए पर छुपता नहीं
कितना दर्द है तेरी इन आंखों में तू छुपाए पर छुपता नहीं तेरे चेहरे में ऐ आंखें तेरी बयां कर देती लवों से पर कुछ न कहती झलक ही आती है चेह�
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पापा पढ़ने जाऊंगी
कविता -पापा पढ़ने जाऊंगी गांव में खुलल आंगनबाड़ी मैं पापा पढ़ने जाऊंगी तुम पढ़ें नही तो क्या हुआ? मैं पढ़कर तुम्हें पढ़ाऊंगी, सीख
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मेरी ख़ामोशी
मेरी ख़ामोशी को मेरा गुरूर मत समझो, क्योंकि बेवजह आवाज देने की आदत नही है मेरी। ख़ामोश रह कर भी अपनी बात समझाई जा सकती है, बस कोई समझने वा�
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मां
खेल कूद कर आए शाम, बदरी हो या घाम। मां की एक झलक दिख जाए, फिर आंचल में छुप जाए। मां कि इतनी बोली प्यारी, अपने बेटे को क्षमा कर देती मां।�
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शिव
छाल पहने पिले रंग कि एक जटाधारी। तीन नयन एक कुंडल माथे चन्द्रधारी। जटा से निकलती गंगाधारी, गले सर्फ कंठ निवाला। शोभे बासहा बैल सवा�
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लघुकथा- चतुराई
‘‘अमा यार, तुम्हें मालूम है! आज मेरे घर साधुओं की फौज आई थी।’’ राजेश ने सहकर्मी गौतम से कहा। गौतम ने अनमने ढंग से जवाब दिया,‘&lsquo
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💝माना कि ये जिंदगी थोड़ी गमगीन है।💐💐
माना कि ये जिन्दागी थोड़ी सी गमगीन है । मामला कुछ ये संगीन है खुद के गमो से बाहर निकल कर देख मंजिले मुसाफिर ये दुनिया अब भी रंगीन है । कि
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