हितैषी तब तक हितैषी रह पाता है,
जब तक उसके निजी स्वार्थ में कोई आँच नहीं आता है।
जब उसके उसके निजी स्वार्थ पर कोई आँच आ जाता है,
तो वो हि� read more >>
आं....शू........
बहे उज्वला मन कि निष्ठा बन,
ज़ो धरे हरित्त हरियाली कि!
आं...शू........
और मान प्रत्तीष्ठा का गौरव,
आंशु केशरिया उमंग सम् लाली सी!! read more >>
मेरी यादों से बचकर कहाँ जाओगे?
हर पल,हर लम्हा बस....
मुझे ही पाओगे?
मेरी यादों से बचकर कहाँ जाओगे?
पर,मेरी यादों के सिवा
मैं फिर भी तुम्हा� read more >>
धरती होगी ऊसर, आहा, आह‌‌ में बदल गया।
लंबी दूरी नाप रहा, स्वार्थ- सीढ़ी से सफ़र।
बढ़गी पैदावार होगी, गुण हेतु धरती बंजर।
रिश्ते नात� read more >>