Kishor Kumar Bhardwaj 23 Jun 2026 कविताएँ समाजिक कोयलांचल 135 0 Hindi :: हिंदी
#कोयलांचल वह भी क्या दिन थे जब भूगर्भ में जाते थे... जब हाथों में लाठी, पैरों में भारी जूते होते थे, सर पर हेलमेट, कमर में टॉर्च की बैटरी बंधी होती थी... पॉलीथिन में लिपटी छोटी सी मैप के सहारे, हजारों सीढ़ियाँ उतरकर अंधेरी राहों में, किलोमीटरों का सफर तय कर उत्पादन स्थल तक जाते थे... ऊपर की दुनिया से कट जाते थे जब नीचे उतरते थे, पत्थरों की छत और कोयले की दीवारों के बीच, साथियों के भरोसे हर कदम बढ़ाते थे... वह बारूद का धमाका, वह ड्रिल मशीन की गूंज, वह कोयले की कड़कड़ाहट, आज भी कानों में गूंज जाती है... कभी अचानक छत से गिरता पत्थर डराता था, कभी भूजल का तेज बहाव रास्ता रोक जाता था, कभी गैस की हल्की आहट भी सचेत कर जाती थी, फिर भी हिम्मत से हर खतरे को मुस्कुराकर हराते थे... पसीने से लथपथ, कोल डस्ट से काला चेहरा लेकर, जब शिफ्ट खत्म कर बाहर आते थे, सूरज की रोशनी भी नई लगती थी, और खुली हवा को फिर से महसूस कर पाते थे... वह कैंटीन की चाय, वह साथियों की हंसी, वह शिफ्ट बदलने की आवाज, वह सीटी और सायरन की पहचान... आज मशीनें बदल गईं, तरीके बदल गए, पर वो जज्बा, वो दोस्ती, वो अपनापन कहाँ मिलता है... कोयले की काली दुनिया में भी, रिश्तों का उजाला बसता था... वह भी क्या दिन थे जब भूगर्भ में जाते थे... धरती की गोद में उतरकर, देश की ऊर्जा का भविष्य बनाते थे... ✍🏼 K_bhardwaj