Kishor Kumar Bhardwaj 23 Jun 2026 कविताएँ समाजिक मलाल 131 0 Hindi :: हिंदी
कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, कुछ तो अधूरा रह गया इस सफर में... जो अनुभव मिला, जो सीख मिली, जो अवसर मिले - शायद उनका पूरा योगदान इस क्षेत्र को नहीं दे पाया... कई सपने थे, कुछ बदलाव की उम्मीदें थीं, कुछ नई राहें बनाने की कोशिश थी, पर समय और परिस्थितियों के बीच कुछ बातें मन में ही रह गईं... फिर सोचता हूँ - जो दिया, वह भी किसी न किसी के काम आया होगा, जो अधूरा रह गया, वह शायद किसी और के हाथों पूरा होगा... क्योंकि खनन केवल धरती से कोयला निकालना नहीं, यह अनुभव, मेहनत और पीढ़ियों को दिशा देने का काम है... फिर भी मन के किसी कोने में एक आवाज आती है - "और बेहतर कर सकता था..." यही शायद उस कर्मभूमि के प्रति अपनापन है, और शायद यही मेरी एक मलाल है.. ✍️ K_bhardwaj