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कविताएँ
लोभ मोह के फेर में
लोभ मोह के फेर में, हुए बर्बाद लोग। अपना भी विरही हुआ, अमन का हो वियोग।। लोभ मोह के फेर में, टूट गया परिवार। हक्का बक्का मन रहे, ज्ञान ह�
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पिता दिवस में कीजिए
पिता दिवस में कीजिए, दिल से उनको याद। जिसने हमको तन दिया, मिले शांति सब साद।। पिता दिवस में कीजिए, भक्ति भाव का साथ। जीवन घर का स्वर्ग �
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पिता जगत मे धर्म हैं
पिता जगत में धर्म हैं, यही तप ज्ञान स्वर्ग। छाया ठंढी नित मिले, मेरे दुनिया सर्ग।। पिता अतप हैं कोठरी, ये ही हैं सब धाम। चरणों में इनके
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कविता
मै पहाड़ हूं। मै सूरज को देखकर पला बढ़ा हूं मै चांद को देखकर उसी तरह टूट जाता हूं जैसे रात को गुलमोहर अपने फूल छोड़ देते हैं .... ललित
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कुत्तों के ठाठ
* कुत्तों के ठाठ * आजकल कुत्तों के बड़े ठाठ चल रहे हैं आवारा हों या पालतू ये मजे से पल रहे हैं।। शेरू जैकी टामी जैसे अब नाम नहीं है श�
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जी करता है तेरा बचपन मैं अपने आंखों में समेट लूं
जी करता है तेरा बचपन मैं अपने आंखों में समेट लूं ऐ वक़्त बीतता जाएगा और तू बड़ा होते जाएगा पर,तेरा बचपन सदा मेरी आंखों में रहेगी तेरी
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लाखों में एक हो तुम।भीड़ में भी तुम्हे खोज लेता हूँ
लाखो में एक हो तुम भीड़ में भी तुम्हे खोज लेता हूँ। पहचान ते तक नही मुजे तुम फिर भी तुम्हे मैं अपना कहता हूं। लाखों में एक हो तुम भीड़ मे�
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आया सावन झूम कर
आया सावन झूम के, निर्मल हो बरसात। कोयल गाती गीत है, मधुर मिलन की रात।। आया सावन झूम के, बादल गरजे घोर। पवन मस्त है रूप में, नई लगी है भोर�
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मुक्तक _छंद
देखो री सखी पावस ऋतु आ गई, रूत गज़ब मस्तानी चारों ओर छा गई, बिजली चमके विद्युत सी सभी को चौकाएं, प्रेम भक्ति के धार धरा पर है फैल गई। हल�
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सावन में प्रीत
सावन का महीना आया, श्याम बदरा बरसे चारों ओर। झूले पड़ गए वृंदा वन में, झूले राधे संग नन्द किशोर। देख बृजवासी अति हर्षाए, दोनों हैं रू
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सावन में प्रीत
सावन का महीना आया, श्याम बदरा बरसे चारों ओर। झूले पड़ गए वृंदा वन में, झूले राधे संग नन्द किशोर। देख बृजवासी अति हर्षाए, दोनों हैं रू
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दुनिया दासी अर्थ की
दुनिया दासी अर्थ की, इसमें में है शक्ति। आज मुख्य है बात ये, करते सारे भक्ति।। दुनिया दासी अर्थ की, पूरा करते शौख। इसको रखिए अब बचा, बन
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