दुआ है-
हे पीहर की तू है राजदुलारी!
तुम्हारी यादों का-
यह मेला रह-रह के गुजरता है!
हंसी और रूठने-
मनाने का हर सिल-सिला!
तुम ही तो थी घर-
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बीत गया वो वक्त जब इश्क को खुदा की अमानत,
समजकर अपनी मोहब्बत को बया करते थें !
आज कल की पिढी का तो कूछ और हीं चल रहा है ,
दिलं से दिलं तक नह read more >>
⭐ कविता = ( खादी )
एक खुदा के हम सारे बंदे !
धर्म की आड़ में खुल गए धंधे !!
खेल रहे हैं खेल यह गंदे !
अवाम में हो गए सारे नंगे !!
कुर्बानियों से � read more >>