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दीवाली की दूज पर-बहना दे आशीष
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" दीवाली की दूज पर,बहना दे आशीष। भाई को करती तिलक,भाई बने मनीष।। दीवाली की दूज पर,दिखे खास �
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मन में भरूं प्रकाश-पावन भव्य विचार से बन जाऊँ आकाश
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" दीवाली की दूज पर,मन में भरूं प्रकाश। पावन भव्य विचार से,बन जाऊँ आकाश। जिसमें खाली गुण र�
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मैं तेरे नाम हो जाऊँ-तुम मेरे नाम हो जाओ
(मुक्तक छंद) मैं तेरे नाम हो जाऊँ, तुम मेरे नाम हो जाओ। मैं तेरा दिल बन जाऊँ,तुम मेरी धड़कन हो जाओ। मजनूं के तरह, जिल्लत नहीं है पसंद म
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रहस्य मय रूप की रानी-कोई मेरे सपनों में आए
(मुक्तक छंद) रहस्मयी रूप की रानी कोई मेरे सपनों में आए। आकर मेरे दिल को सहला कर वह चुरा ले जाए। मेरा तो कोई वस चलता ही नहीं है अब कहूं क्�
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रोजी रोटी के लिए-परेशान हैं लोग
(दोहा छंद) रोजी रोटी के लिए, परेशान हैं लोग। कुछ जन को तो बहुत है,कुछ को कुछ मत भोग।। रोजी रोटी के लिए, करना पड़ता काम। करा मेहनत से मिले
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क्या कहूं आज मैं आप से-डरता मैं हूं बहुत पाप से
(मुक्तक छंद) क्या कहूं आज मैं आप से। डरता मैं हूं बहुत पाप से। मैं प्यार का एक मस्त राही- डरूं नहीं कद की नाप से । (स्वरचित मौलिक) संद�
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रात का दर्पण-चंचल चांदनी है जगमगाते तारें
चंचल _चांदनी है,जगमगाते तारें , महकी रात है। आंखों में आनंद की रौशनी है, लब पर मधुर गीत के बोल हैं। सफ़ेद आसमान यूं देख रहें हैं, जैसे उ�
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रहस्य-दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था
उसका आना और जाना मेरे लिए कौतूहक था, दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था। बहुत ही रहस्यमय लग रही थी वो, पूरी शरीर में एक मादकता भर
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उजला तन किस काम का-काला जब हो सोच
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उजला तन किस काम का,काला जब हो सोच। ऐसे जन सब ही यहाँ,करते रहते नोच।। उजला तन किस काम का,जिसक
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जीना है तो सीख ले-श्रम करना ओ यार
विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जीना है तो सीख ले,श्रम करना ओ यार। मिले मेहनत से खुशी,छोड़ो मत अधिकार। करें यहां निर्माण,�
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तेरी क्या औकात है-पहने हुए नकाब
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" तेरी क्या औकात है,पहने हुए नकाब। बातें भी बेकार है,रखता नहीं जवाब। मैं तो हूं अब शेर दृढ�
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काटे कटी न रात अब-आँखों में है नूर
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" काटे कटी न रात अब,आँखों में है नूर। कदमों में है जोश अति,खुद पे करूं गुरूर। परचम अपना ही उ�
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औजार-जिसके सहारे बना दूं कोई नवीन किस्सा
औजार को भी बना लूं अपना हिस्सा, जिसके सहारे बना दूं कोई नवीन किस्सा। जिसे सुनकर लोगों में खूब जोश जगे, फिर हर मुश्किल आसान ही आसान लगे।
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प्रेमश्वर की भक्ति में-जीवन करें निसार
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" प्रेमश्वर की भक्ति में,जीवन करें निसार। जीवन होगा तब सफल,सुखी रहे परिवार। चले वंश तब वृ�
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जलता दीपक आस का-हृदय चाहता खास
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जलता दीपक आस का,हृदय चाहता खास। लब से निकले प्रेम ही,मिटे सभी की प्यास। सफल भव्य किरदार स
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माया जोड़ी रात दिन-सबल किया परिवार को
#विधा:- मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" माया जोड़ी रात दिन,लिया बहुत ही दर्द। सबल किया परिवार को,बना रहा दृढ़ मर्द। हँसकर आगे को
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अपने को जो मानते-करता दृढ़ किरदार
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अपने को जो मानते,लगते हैं दिलदार। ऐसा दिल अब है लगा,करता दृढ़ किरदार। ऐसे दृढ़ किरदा�
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करते नहीं विचार जो-उल्टे सीधे काम से
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,उसे बुद्धि है भ्रष्ट। उल्टे सीधे काम से,करे प्रगति को नष्ट। और गँवा�
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खेत होगा खलिहान होगा -चौड़ी सड़कें घर आलिसान होगा
काव्य रचना - ना कोई इंसान होगा सूरज होगा चांद होगा ये धरा और आसमान भी होगा, पर्वत होगा श्मशान होगा पर मुझे लगता है ये इंसान न होगा। खे
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तलाश नौकरी-हमारी कहानी का किरदार क्या जानोगे
हमारी कहानी का किरदार क्या जानोगे हम तो अपना ही यार को छोड़ बैठे है सिर्फ उसके साथ रहने से अगर मिल जाती मंजिल तो क्या बात थी
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अकेले-जब गुंजाइश की कसर न हो
जब गुंजाइश की कसर न हो अपनो की शिकायत का असर न हो तो शायद मिलता है बड़ा रास्ता जब सिर्फ चलते रहने की धुन सर पर हो
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गांव और मैं-धूप की तपन में या अंधेरों से किनारा
धूप की तपन में या अंधेरों से किनारा हजार हजार ख्वाहिश की कल्पना है सारा और मन को बहलाने की कोशिश ही बेकार है मन लगता है अपने गांव में औ�
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मां और घर-परिवार की बंदिशों में दफन
मैने देखा उसकी आंखो में लोहे जैसी आग की तपन थी वही हर रोज खून का घूंट पीना मगर परिवार की बंदिशों में दफन थी
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शहर और व्यापार-शहर बुलाता तो है मगर व्यापार के खातिर
बहुत है लेकिन हर बार के खातिर मकान तो लेकिन किरायेदार के खातिर और जो कहते है शहर बुलाता सबको है शहर बुलाता तो है मगर व्यापार के खातिर
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