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सुख दुख
एक सुख को प्राप्त करने के लिए हजारों दुखो का सामना करना पड़ता है, फिर भी मनुष्य खुश नहीं रह पाता है किसी भी चीज की अत्यधिक कामना करना सफ�
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तज़ुर्बा
तजुर्बा से कोई मोहब्बत नहीं होती किसी से बेपनाह मोहब्बत करके हर तरीके का तजुर्बा प्राप्त होता है। लेखक पंकज कुमार बुड़ाकोटी
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अपमान
अपमान करने के लिए बुरे शब्दों की जरूरत नहीं होती, किसी को बुरी निगाहों से देखना भी उसका अपमान होता है । पंकज कुमार बूडाकोटी
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कलम
गलत शब्दों का कागज पर उतारना कलम का दोष नहीं यह तो लिखने वाले की सोच और कलम चलाने के ढंग पर निर्भर करता है ।
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हर राहों मे युंहीं चले चलो
व्यथा को बनाकर दिप्त दिप्त, हर राहों मे युहीं चले चलो! चाहत को दबाकर हृदय मे, विश्व को तुम धारण कर लो!! व्यथा चाहत का अमर कुंज,
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गर देख लिया क्या बुरा किया
गर लाख कोशिशें हो शिद्दत कि, तब मिलतें हैं दो चार नज़र! चलतें ही रहें कर ध्यान मग्न, मंज़ील के राह कि डगर- डगर!! कभी व्यस्त मिलें
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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चलकर गिरना गिरकर चलना
चलों तो राह हर वक्त नयी, क्या धरा पड़ा दोहराने मे! चलकर गिरना गिरकर चलना, है धरा पड़ा नज़राने मे!! खाकर ठोकर गिरता है मनुज,
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वशुधा-अम्बर का अचल साथ
कर लाख कोशिशें शिद्दत कि, मुद्दत से पाए राह किरण! वशुधा-अम्बर का अचल साथ, दे रही किरण इस वशुधा पर!! पर किरण न कोई पंख रखे,
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कर्म का अभिनंदन
धरा धरी वीरों कि गती से, है दृश्य चेतना चंचल सी! कंचन है जगत के कथित कथा , और पावन जग के कर्म सभी!! चलती है हवा ले कर जगती का,
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ভারত বিজয়ী পথে
সোনার মনে স্বর্ন স্বপনো, চলে চোখের বনে! সান্ধিন্তার ই সারা ভারত, ভিন্জে সে সাবোনে!! কর্মো গড়িতে দিলো আবাজ, স্বর্ন �
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टिकाकरण अधिकार अपना
कर्म योग अती पावन निष्ठा, छल भी छलीत हो जाती है! बलवान कि हिम्मत भी आकर, अधरों मे दलीत हो जाती है!! पर्वत कहां झुकते है नदियों
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रश्मी रथी बनु
समा बांध अविराम करे, आशाओं के चाहत पल पल! नयनो के गतीमय प्रगतीमान, उठती है दर्रख्तें कल कल कल!! अती अती अतिश्य चर्म कर्म,
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नमो नमो शीव हरे हरे 02
समर विशोनित सूर्यवंश, भगिरथ के वंश मे जन्म लिए, दशरथ नंदन श्री राम चन्द्र, रघू कूल के रीत के पालक थे!! रावण मृत्यू पश्चात राम को,
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नमो नमो शीव हरे हरे
राजा सगर दिग्गज रण विजयी, धरती पे ऋश्र बड़ाने को! कर रहे थे धरा पर महा यज्ञ, देव राज कहलाने को!! मानव कल्याण के सत्य धर्म,
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महा पूरूषोत्तम-शीव संकर
महा पूरूषोतम शीव संकर, दया दान के दाता है! पूरुषार्थ मर्यादा के पालक, शीव चरण मे शीश नवाता है!! जन्म - जन्म के दू:ख: हरता,
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दिपावली
बालमिक रिषी कर्मों को, करता हूं नमन मैं श्रद्धा से! तूलसी को नमन है कोटी - कोटी, मेरी प्रमार्थ की अविधा से!! चरितार्थ नाम को दिव�
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अरूनोदय की आश लिए
मैं सोंच रहा था पवन तपोवन, अंतर मन के दृड़ चेतन से! अंधकार की विफल चेष्टा, अरूनोदय की आश लिए!! करूण चेष्टाओं की ध्वनी,
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माधुर्य मधूर वाणी कि दिशा
माधुर्य मधूर वाणी कि दिशा, निज कर्मो से मै रोक पाता! कर्म को मिलता तनिक छाह, गर कर्मो से राह मुझे मील जाता!! अविचलता कि हुंकारों स
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बस एक नाम बस नाम नाम
है अविचलताओं कि करूण धरा, मिट्टी आज़ादी की निशानी है! है शुज्ला, सफ्ला देश मेरा, वतन परस्ती जिसकी कहानी है!! हर ज़र्रों के एहसा
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चलती है हवा
चलती है हवा ले अधरों से, बिते सारे ऐहसास कई! कूछ उठी धूनी सी सिमट गई, अरमानो के ज़सबात लिए!! ज़सबातो की ले करूण कथा, कि
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मीली हवाओं मे खूशबू
मीली हवाओं मे खूशबू, मूझको लगता कूछ यहां वहां! है एक पहर मे र्दद कई, कूछ अपनो सा कूछ सपनो सा!! झकझोर रही है दृश्य सभी, अ
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পরম সু:খম সন্তাপ করম
পরম সূ:খম সন্তাপ করম, অভিদা , নিবিদা পরবস্তী তে! এই মনের নগরকে উচ্চো রাখে, কোতোই বেদনা হারিযে দে।। আপ: হৃদয জোদী কষ্ঢে থাকে,
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অমর্তবের আবাজ
আবাজ মনের জা মীটী নেই, ও হৃদযের বেদনা অমর থাকে! জা কর্ম পথ দিযে সোরী নেই, ও নাম ধরা তে অমর থাকে।। নিজ ব্নদন তে অভীন্নদন দে, �
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