(दोहा छंद)
किसी ने उस से किया था फरेब,
उदास हो निकाल दी थी पाजेब,
आया उसके लिए खुशी बनकर,
मैं बन गया हूं अब उसका कालेब।
(स्वरचित मौलिक)
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(मुक्तक छंद)
मस्त कशिश में महक है,आकर्षण भी खूब।
पास चले आते सभी, लगती है महबूब।
गजब श्रृंगार में रहे, करती दिल पर राज_
कायल उसका है सभी, � read more >>
(दोहा छंद)
कुछ तो काला दाल में, सूरत पर है हर्ष।
बात करें वह गर्व में, फिर भी हो उत्कर्ष।।
कुछ तो काला दाल में,मिलता मुझ से रोज।
करता बात� read more >>
जी हां, 80 और 90 के दशक के हम सब भारतीय अपने हिंदू समाज के सभी रीति रिवाजों के साक्ष्य हैं। जैसा बचपन हमने जिया है वैसा बचपन हमारे बच्चों क� read more >>