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नारी अस्मिता पर प्रश्न-वीरेंद्र देवांगना

नारी अस्मिता पर प्रश्न::
खुद के मंत्रिमंडल में मंत्री रही महिला नेत्री को पूर्व मुख्यमंत्री के द्वारा ‘आइटम’ कहना यही दर्शाता है कि जिन बुजुर्गवार नेताओं को मर्यादित रहकर दूसरों को मर्यादा का पाठ पढ़ाना चाहिए, असल में वे ही अमर्यादित हैं?
तिसपर तुर्रा यह कि वे अपने अमर्यादित बोल के लिए माफी तक मांगने को तैयार नहीं। जबकि उनकी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष, जिनको वे अपना मार्गदर्शक मानते हैं, ने इस कथन को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है।
लगता है मामला खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे सहित अहंकार की पराकाष्ठा है। एक बुजुर्ग नेता जो बरसों तक केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य रहा हो, वह ऐसे असहनीय बोल बोले और अपनी गलती मानने को तैयार न हो, उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि वह अपने-आप को खुदा से कम नहीं समझ रहा है।
यह भी आश्यर्चजनक है कि इसी पार्टी की कमान एक महिला नेत्री के हाथों में हैं, जिनके मुख से उस नेता के प्रति एक शब्द भी नहीं फूट रहे हैं, जिसने नारी की अस्मिता पर कटाक्ष किया है और उपचुनाव में पार्टी को हाशिए पर ढकेल दिया है।
मामले की गंभीरता के दृष्टिगत इस नेता पर सीधी कार्रवाई की जानी चाहिए थी। लगता है यह पार्टी की नजर में ऐसा नेता है, जो पार्टी के लिए लक्ष्मीपुत्र है।
इस पार्टी का बिगड़े बोलों से पुराना नाता है। इसके पूर्व भी एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी ही पार्टी की नेत्री मीनाक्षी नटराजन पर अभद्र टिप्पणी की थी, लेकिन उसका बाल तक बीका नहीं हुआ। वह पार्टी का कर्ताधर्ता अभी तक बना हुआ है। इतना ही नहीं, एक पूर्व केंद्रीयमंत्री ने पत्नियों को लेकर अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया था।
एक और नेता ने सवर्ण महिलाओं से दूसरी शादी करने का गंदा बयान दिया था। एक तो उसी महिला नेत्री को ‘जलेबी’ कह दिया, जिसके प्रति की गई अभद्र टिप्पणी से पूर्व मुख्यमंत्री की आलोचना हो रही है।
इससे देश-प्रदेश का सियासी पारा चढ़ गया है। बसपा सुप्रीमो ने माफी मांगने की मांग की है, तो स्मृति ईरानी और सरोज पांडेय ने कार्रवाई की मांग की है। वहीं, मप्र के मुख्यमंत्री ने अशोभनीय बोल बोलनेवाले को पार्टी के सारे पद छीन लेने के लिए दबाव बनाया है। इसी तरह की मांग भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी की है।
उधर, महिला आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कांग्रेस नेता को नोटिस जारी की है। चुनाव आयोग ने भी नोटिस जारी कर संज्ञान लिया। जवाब देने पर ऐसी बयानबाजी दुबारा न करने की चेतावनी दी है, जो केवल खानापूर्ति लग रहा है। उधर, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने ग्वालियर प्रशासन से घटना का विवरण और जांच प्रतिवेदन मांगा है
हैरत की बात यह भी कि कुछ नेताओं ने इसे जातिगत रंग देने की कोशिश की है, जबकि यह मामला अनुसूचित जाति, जनजाति, अगड़े-पिछड़ेवर्ग या अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का नहीं है, बल्कि नारी के सम्मान का है। उसकी अस्मिता का है। फिर चाहे वह किसी जाति या धर्म की क्यों न हो।
यह तो ऐसा ही हुआ कि बलात्कार के मामले में हाथरस को तवज्जो दे दी जाए और बाकी मामले में एक शब्द न बोला जाए। जबकि बलात्संग, बलात्संग होता है, वह किसी लड़की या महिला के साथ भी घटित हो, सर्वथा निंदनीय और आपराधिक कृत्य है। ऐसे गंभीर मामलों में वही भेदभाव कर सकता है, जो स्वार्थपूर्ण सियासत करता रहता है।
ऐसे तमाम मामलों में समदृष्टि की जरूरत है, ताकि अपराधियों की हौसला अफजाई न हो। फिर चाहे नारी पर अशोभनीय टिप्पणी हो, नारी-उत्पीड़न हो, घरेलू हिंसा हो, मानसिक प्रताड़ना हो, लव जिहाद के चलते किसी युवती की हत्या हो या फिर दुष्कर्म। महिला अपराध के सभी मामलों में समान दृष्टि डालने से ही देश में सुधार संभव है।
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