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पेट्रोल-डीजल के खेल में सबके हाथ काले-भाग-1-वीरेंद्र देवांगना

पेट्रोल-डीजल के खेल में सबके हाथ काले-भाग-1
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम के घट-बढ़ के हिसाब से भारत सरकार 16 जून 2017 से प्रतिदिन पेट्रोल-डीजल का दाम निर्धारित करती आ रही है। यह व्यवस्था लागू होने के दो-ढाई साल बाद पेट्रोल और डीजल के दाम में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो उपभोक्ताओं के लिए दुबले को दो आषाढ़ साबित हो रही है। महंगाई के इस दौर में दोनांे ईंधनों की कीमत रिकार्ड स्तर तक पहुंचने से सबओर हाहाकार मचा हुआ है।
केंद्र सरकार तेल पर एक्साइज कर के रूप में रोजाना 660 करोड़ रुपए से अधिक कमा रही है, तो राज्य सरकारें प्रतिदिन 450 करोड़ बटोर रही हैं। गणित यह कि केंद्र सरकार 26 रुपए में 1 लीटर कच्चे तेल का आयात करती है, जिसे पेट्रोलियम कंपनियां खदीदती हैं। पेट्रोलियम कंपनियां इसमें प्रवेश कर, शोधन का खर्च, माल उतारने की लागत और मुनाफा जोड़कर उसे डीलर को 30 रुपए प्रतिलीटर के हिसाब से बेचती हैं। इसमें केंद्र सरकार 19 रुपए का उत्पाद शुल्क लगाती है।
इसके बाद इसमें 03 रुपए प्रतिलीटर डीलर कमीशन जोड़ा जाता है। इसमें 28 रुपए राज्य सरकारें औसतन वैट टैक्स और सेल्स टैक्स लगाती हैं, जो उपभोक्ताओं को 80 रुपए औसतन प्रतिलीटर बेचा जाता है।
यह सच है कि कुल खपत में आयातित कच्चे तेल का अनुपात, रिफाइनिंग यानी कच्चे तेल को साफ करने में होनेवाले व्यय उनके परिवहन के खर्च के आधार पर तेल का बाजार मूल्य निर्धारित होता है।
अफसोस यह है कि पेट्रोलियम पदार्थाें को जीएसटी से बाहर रखा गया है। केंद्र सरकार इस पर उत्पाद शुल्क लगाती है, जबकि राज्य सरकारें विभिन्न दरों पर वैट (मूल्यवर्धित कर) या सेल्स टैक्स लगाती हैं।
राज्य सरकारें मूल्य के अनुसार, जो वैट या सेल्स टैक्स लगाती वह पेट्रोल पर कम से कम 16 फीसदी और अधिकतम 40 प्रतिशत अर्थात औसतन 28 फीसद है। जबकि डीजल पर टैक्स की दरें औसतन 20 फीसदी है, जो न्यूनतम 12 प्रतिशत व अधिकतम 29 प्रतिशत है। हमें एक राज्य से दूसरे राज्य में तेल की खुदरा कीमतों में जो गौर-ए-काबिल अंतर दिखता है, उसका कारण यही है।
इस संबंध में एसोचैम के राष्ट्रीय महासचिव का कहना है कि तेल दामों में हालिया बेतहाशा बढ़ोतरी से आम आदमी को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हालात को संभालने के लिए पेट्रोल और डीजल पर लगे करों में कटौती करना सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
इसके अलावा, पेट्रोल और डीजल को माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत लाया जाना चाहिए। करों में कटौती करने से हमारा निर्यात भी अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा। साथ ही, इससे चालू खाते का घाटा भी कम होगा। इससे देश की करेंसी को गिरावट को भी संभालने मंे मदद मिलेगी।
हालांकि इसके लिए सरकार फौरी तौर पर सक्रियता तो दिखाती है, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आता है। उसको समझने की जरूरत है कि यह मामला सीधे तौर पर आमजन की जेब पर डाका डालने का मामला है। इससे जहां माल ढुलाई भाड़ा व यात्री भाड़े में अपरोक्ष बढ़ोतरी होती है, वहीं पेट्रोल, डीजल, केरोसिन व रसोई गैस की परोक्ष बढ़ोतरी से उपभोक्ता की कमर टूटती हैै।
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