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सैलाब का सितम::-वीरेंद्र देवांगना

सैलाब का सितम::
बंगाल की खाड़ी से उठनेवाले समुद्री तूफान से आंध्रप्रदेश व तेलंगाना राज्य सहित हैदराबाद में पानी का कहर ऐसा बरपा है कि लोगों की जिंदगी बेहाल हो गई है। अक्टूबर का महीना लौटते मानसून का वक्त है, जिसमें 8-12 इंच से अधिक मूसलाधार पानी बरसा है। कहा जाता है कि 117 साल बाद अक्टूबर माह में आंध्रप्रदेश व तेलंगाना राज्य में ऐसी भीषण बारिश हुई है। अकेले हैदराबाद में 15 लोगों की जाने चली गई है। वहीं, आंध्रप्रदेश में 10 लोग मौत के मुंह में समा गए।
हैदराबाद में जमीन खिसक गई है। गगन पहाड़ क्षेत्र में दीवार गिरने से एक बच्चे समेत तीन व्यक्तियों की मौत हो गई है। चंद्रीगु्ट्टा पुलिस केंद्र में दो घरों की दीवार धसकने से एक बच्चे सहित दस की मृत्यु हो गई। वहीं, एक हादसे में घर की छत गिरने से 40 वर्षीय महिला के साथ उसकी बेटी को पानी ने लील ली। गे्रटर हैदराबाद में ऐसा जलजमाव हो गया कि सड़कों पर दस-दस फीट पानी भर गया।
हैदराबाद में बिजली-पानी की आपूर्ति रोक दी गई। टैªफिक थम गया। निचले इलाकों व सड़कों में कई-कई फीस पानी भर गया। लोग जहां थे, वहीं फंस गए। कई लोग पानी के तेज बहाव से बह गए। हैदराबाद के बोवेनपल्ली इलाके में एक कार बहकर दूसरी कार पर चढ़ गई। सोमाजीगुड़ा में बाढ़ का पानी तेजी से यशोदा हास्पिटल में धुसा, तो हास्पिटल के मरीजों व कर्मचारियों में अफरातफरी मच गई।
हैदराबाद का हुसैनसागर झील उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी उफनने लगी। हैदराबाद के खैराताबाद, टोली चैकी, बोरबंदा, सिकंदराबाद, अंबेरपेट, एल्बीनगर, वनस्थलीपुरम, हयातनगर और अब्दुल्लापुर में भयावह मंजर देखने को मिला।
उधर, तेलंगाना व आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री फखत स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं और पीड़ित परिवारों को फौरी राहत देने के लिए मुआवजे की घोषणा कर रहे हैं।
यह बारिश उत्तरी कर्नाटक से होते हुए मध्य महाराष्ट्र और गोवा की ओर बढ़ गया, फलस्वरूप पुणे-मुंबई-गोवा में जमकर बारिश हुई। इन शहरों का भी मंजर लगभग वैसा ही रहा, जैसा हैदराबाद का था।
सवाल यह कि इधर मेट्रो और स्मार्ट सिटियां विकसित करने का दंभ भरा जाता है और इसके नाम पर करोड़ों फूंक दिए जाते हैं, लेकिन उधर बारिश से जानमाल की अपार क्षति होती रहती है। स्मार्ट सिटी के नाम पर की जा रही यह खानापूर्ति महज धोखा है। इसमें सड़क तो बना दिए जाते हैं, बेतरतीब लोगों को बसाया भी जाता है, लेकिन पानी निकासी की माकूल व्यवस्था नहीं की जाती है।
यदि हैदराबाद, मुंबई, पुणे, सोलापुर, सांगली, सातारा में पानी निकासी की माकूल व्यवस्था रहती, तो हर साल आनेवाले बारिश से इतनी तबाही नहीं होती, जितनी कि होती रहती है। मुंबई में तो हर बारिश के मौसम का यही रोना है। वहां जरा-से बरसात से सड़कें जाम होना आम बात है।
यहीं नहीं, भारत के सभी शहरों का कमोबेश यही हाल है। इन शहरों में नगरनिगम और महानगरपालिकाएं हैं, चुने हुए प्रतिनिधि हैं, भारी-भरकम अमला है, जहां की बजट कई राज्यों की बजट से भी अधिक हैं, लेकिन सब में वही कोताही और लापरवाही का आलम है।
नगरों के शासकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग बारिश से दम तोड़ रहे हैं, महामारी से दम घुट रहा है या प्रदूषण से मौते हों रही हैं। इन्हें तो अपना उल्लू सीधा करना है और अपनी तिजोरियां भरना है और तबाहियों के बाद समीक्षाएं करना है और चंद घोषणाएं, ताकि लगे कि सरकार नाम की कोई चीज है। इसके बाद, फिर चुनावों में मशगूल हो जाना है और अगली वर्षा के लिए वही सितम रह जाना है।
यह कैसी विडंबना है कि जो पानी देशवासियों के चेहरों पर खुशियां लानी चाहिए, वे उसे चिंताओं और परेशानियों में डूबो देते हैं।
जल-प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिलसिला थमनेवाला नहीं है। कारण कि जिन शहरों, नगरों व महानगरों में कभी सैकड़ों तालाब, झील व झरने रहा करते थे, जो पानी को सोखने और अपने में समाने का काम करते रहते थे, उन पर कांक्रीट के जंगल उगा दिए गए हैं। राजनीतिक स्वार्थपूर्ति ने उनपर लोगों का घर बसा दिया है। खेती की जमीनों में उपनगर बसाए जा रहे हैं। उद्योगों के नाम पर पर्यावरण की बलि चढ़ाई जा रही है। अंधाधुंध निर्माण कार्य हो रहे हैं।
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