उठावना – जितेंद्र शिवहरे

उठावना – जितेंद्र शिवहरे

मुझे आज तक उठावना शब्द का शाब्दिक अर्थ समझ नहीं आया। मैं समझता था की जब किसी इंसान की मौत होती है तब उसके शव को उठाना ही उठावना होता होगा? लेकिन जब वास्तविकता देखी तो उठावना शब्द से मेरी आस्था का ही उठावना हो गया। परिवार के कुछ सदस्य किसी हाॅल या बरामदे में नीचे बैठे होते है। समाज के कुछ लोग उनसे मिलने आते है , उन्हें सांत्वना देते है। इसे ही उठावना कहा गया है। अरे भई जब सब लोग नीचे बैठे है, कोई उठ ही नहीं रहा हो तो इसे उठावना क्यों कह रहे हो? इसे बिठावना कहो न!
और फिर जब आदमी ही दुनियां से उठ गया फिर तुम क्या उठाने बैठे हो? उस आदमी का शव तो पहले ही फूंक-फांक कर आ गये और अब कह रहे हो की आज संबंधित मृत व्यक्ति का उठावना है! और हां, आप तो ऐसे लोगों को भी उठावना करते है जिनका जमीन पर कभी बिठावना नहीं हुआ। वो तो सारी उम्र “इसको भगावना, उसको भगावना” में ही लगे रहा। मैं तो कहता हूं ऐसे आदमी का न तो उठावना होना चाहिए और न ही बिठावना। उसका तो बस हटावना होना चाहिए। अच्छा उठावना में कुछ लोग चटावना से बाज नही आते। उनकी नज़र तो बस यही ढूंढ रही होती है की कहीं कोई खाने-पीने की व्यवस्था हो जाये तो मजा ही आ जाये। कई लोग तो उठावने में आते ही नहीं। उनका ये कहना पड़ता है की मैंने जब लाश को ही उठा कर उसका शमशान पहूंचावना कर दिया तो मैं उठावने में क्यों जाऊं?
ईश्वर वहां ऊपर से ये सब देख मंद-मंद मुस्कुरा रहे होते है। भगवान कहते है तुम नीचे बिठावना वाले कितने भी उठावने आयोजित करवा लो मगर जब तक मेरा मनुष्य को बुलावना नहीं हो सकता तब तक न तो कोई उठावना हो सकता है और न कोई बिठावना। आगे मानव तेरी इच्छा?

 

      जितेंद्र शिवहरे

   चोरल महू इन्दौर

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