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Kishor Kumar Bhardwaj

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My Articles

#योग_हुआ वो दिन था जैसे सहर नई, मन में उजला संयोग हुआ। सदियों का तप थम गया वहीं — जब नयन मिला, योग हुआ। तेरी हँसी, मौन का कोई राग बनी, जो � read more >>
मुझको न रोकिए, न सलाहें दीजिए, मेरा सफ़र अलग है, मुझे जाने दीजिए। हार भी मिले अगर, तो मुस्कराने दीजिए, क़िस्मत को हमें अपनी आज़माने दीज� read more >>
" जुगनुओं ने शराब पी ली है.." (✍️तीखा व्यंग्य - के. भारद्वाज) जुगनुओं ने शराब पी ली है, अब ये सूरज को गाली देंगे, दो घूंट सत्ता की, तीन झूठ ता read more >>
"✍️निर्णय और समय - के.भारद्वाज" कल जो निर्णय था - वह तब सही था, भले ही आज उसके मायने बदल गए हों। आज जो ठाना है मन ने, वह अब सही है, भविष्य म� read more >>
कविता: 🏅 “खेल का दीप जलाओ” 🏆 मैदान बुला रहा है तुमको, आओ खेल दिखाओ, दिल में जोश, आँखों में सपना - आगे कदम बढ़ाओ। पसीने की हर बूँद यहाँ, मे� read more >>
"स्वतंत्रता का अमर गान" स्वतंत्रता… कोई क्षणिक उत्सव नहीं… ये रणभूमि की अमर कहानी है… शहीदों के रक्त से सींचे सपनों की… भारतवासियों read more >>
हरियाली संग संवत्सर बिते फागुन मास संन्यास के पतझड़ के बाद जंगल दहक रहा जब खिले फूल पलाश के जब वन-उपवन सुखें हो जल की हो सबमे अमिट प्यास read more >>
*"वक़्त की स्याही में लिपटी ज़िंदगी"* किसी ने आज हंसकर पूछा, "कौन है वो.?" हम भी मुस्कुराए, मगर जवाब यूँ दिया— "किसी के कानों की बाली में जड़� read more >>
घाट का एक ख़ामोश पत्थर हूँ मैं, मैंने नदी के हज़ार नखरे देखे हैं… कभी लहरों की हल्की छुवन, तो कभी बाढ़ के ग़ुस्से देखे हैं… कभी किसी न� read more >>
नील गगन के नीचे, जलधारा के बीच, एक नाव चली, बहती रीतम - रीत। नाव की देहरी पर बैठी कोई, मानो स्वप्नों से आई जलपरी। नयनों में गहराई, लहरों-� read more >>
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