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Naresh kumar

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उम्मीद की लौ, लड़खड़ा के जल रही हवा,सारी हमारे, खिलाफ चल रही है तोहफे थे जितने सारे,अंधेरो को मिल गये अफसोस,करके रोशनी,हाथ मल रही है � read more >>
कुछ क्षण की विवशता है मेरी परिचित हूं मैं, परिणामों से पर आने दो मैं अंबर को नापूंगा अपनी उड़ानों से मुझे नाम की चिंता जरा, नहीं विख read more >>
ग़ज़ल नमक से हाथ जख्मों को, मिलाना पड़ता है कि मजबूरी मे तुझसे, मिलने आना पड़ता है पता है चोट देगा,पर सफर में साथ तो है हमें पत्थर से ह read more >>
है तो चालाक, मगर दिखता है नादान बहुत या तो खुदा है वो,या फिर है ,शैतान बहुत उसके दिल में है क्या,उसका तो खुदा ही जाने पर वो लहज़े से तो, ल� read more >>
खुदा भी आयेगा न तुझको, बचाने के लिए जरा सम्भल के आना , मुझको डुबाने के लिए तू जानता है मैं तुझको नहीं, समझता कुछ तू जो भी होगा और होगा,ज� read more >>
पडौसी से ऊंचा, मकान कर रहा है नहीं जितना उतना गुमान कर रहा है किसी को किसी का, सुहाता नहीं सुख आदमी, आदमी को, परेशान कर रहा है कोई कीमत ग read more >>
पडौसी से ऊंचा, मकान कर रहा है नहीं जितना उतना गुमान कर रहा है किसी को किसी का, सुहाता नहीं सुख आदमी, आदमी को, परेशान कर रहा है कोई कीमत ग read more >>
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