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Preksha Tripathi

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My Articles

हूँ व्यथित आज मैं सोच के यह, कि कल क्या, कैसा, क्यूँ, होगा? क्या जो है आज, वही कल होगा? या फिर भाग्य ही मुह मोड़ेगा? मेरे उर की उथल पुथल read more >>
हम तो ठहरे मध्यम वर्गी न ऊँचा स्वप्न सजाते हैं। एल० ई० डी० का ख़्वाब छोड़ सौ वटिया को ही जलाते हैं।। न फ्लोर कवर न ए० सी० कूलर न सीलिं� read more >>
क्यूँ इतने खामोश हो तुम? साँस है बेहोश हो तुम। जी रहे हो जानकर कि और कुछ न हो सकेगा। खिल उठा हूँ अब तो केवल मधुरसों का भोग होगा।। काटत� read more >>
आज मैंने चाय बनाते हुए यह अनुभव किया कि, चाय बनाने से ज्यादा कठिन होता है चाय को छानना। मैंने उतने ही प्रेम से चाय की पत्ती पात्र में डा read more >>
कलम कलम में कविता का अंश दिखाई पड़ता है। अधर अधर से कविता का नवकुंज् सदा ही झड़ता है।। काव्यबद्ध हो जीवन तो, यूँ भाव सरल हो जाते हैं। read more >>
कैसे भूल सके है भारत चौदह अगस्त का वह अशुभ क्षण। दो सौ वर्ष गुलामी झेली अब कैसे झेल सकेगा विभाजन।। एक ओर जब भारत को आज़ादी का दर्पण द� read more >>
संप्रति उर की विडंबना दूजा कलुषित मन। तमिसावरण भविष्य का मस्तिष्क करे क्या चिंतन? पामर का वासर रोष भरा। अकर्मण्यता का दोष भरा। जि� read more >>
धन्य -धन्य है भाग्य हमारा, भारत माँ की गोद मिली। माँ का विह्वल पावन आँचल, हर क्षण खुशी अमोल मिली।। मातृभूमि पर न्यौछावर, हो जाने की अ� read more >>
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