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Santoshi devi
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, Rajasthan
मैं एक कवियत्री हूँ। साहित्य में मेरी रुचि है।
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पथिक
तुम सृजन पथ के पथिक, नित-नित नव निर्माण करो। लक्ष्य भेदन खातिर, तन- मन से संधान करो। राहे सुगम है नहीं, पग- पग कांटे बिखरे हैं। चलता जाए
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निशा
भूख में बासा भात , स्वादिष्ट व्यंजन है। वही तृप्ति में बेस्वाद। सवेरे का अनवरत होना, जिंदगी का रुकाव है। दुख में चिंतन का पर्याय, खाम
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माँ
माँ तेरे आँचल की छाया,दुःख संताप हर लेती हैं बाल सुमन मन में सदा, स्नेह सुवास भर देती हैं। चमक नींद शरद रातों की, सूखे में मुझे सुलाती �
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अंधविश्वास
फेर अंधविश्वास का,ऐसा देता रोग। होते फिरे भ्रमित यहाँ,ज्ञानी ध्यानी लोग।। समृद्धि सौरभ भर खिले,जीवन उपवन फूल। हुई अंधविश्वास की,नष�
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दोस्ती
याद रहे यह हरदम सबको,दोस्ती का जमाना। बात-बात पर खुल कर आता,सबको खिल खिलाना।। बिना स्वार्थ का सुंदर रिश्ता, टिकी रही सब आसा। खाए मिलज�
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परोपकार
विषय-परोपकार दूजे अंतर मन की पीड़ा, क्यों कोई है जाने। अपने से बढ़ इस जीवन में, पीर नहीं वह माने।। साध रहे सब काज यहां पर,देख-देख कर मौ�
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दिन
गुजर सकेंगे हर दिन सब बेकार के। मौसम आएगें ये जल्द बहार के।। भूल गए कष्टों को सपना जान के। खुश होंगें पल सारे रोज गुजार के।। जश्न मन�
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सोच
उजड़ गई बस्तियां बहुत सी है बनाने से पहले। थोड़ा सोच लेना दिल किसी का दुखाने से पहले।। करते हादसे घायल जिंदगी बसर तक यारों। कैसे जी सका
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फागुन
रंग बसन्ती रंग में,चलती मस्त बयार। रोम-रोम पुलकित करे,जगा नेह मनुहार।। कलियां कोमल खिल उठी,फागुन भीगे रंग। रंग सृजन का भर रही,नव उमंग
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दिन
गुजर सकेंगे हर दिन सब बेकार के। मौसम आएगें ये जल्द बहार के।। भूल गए कष्टों को सपना जान के। खुश होंगें पल सारे रोज गुजार के।। जश्न मन�
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