Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

कर्म और फल-अजय-प्रताप सिंह

कैसे संपन्न होगा कोई
ऋण सेऔर ऋण माफी से |
हाथ पैर खुद काट रहा है
निश्चिंत हुआ बैसाखी से ॥
बिना परिश्रम धन मिलता है
और माफ हो जाता है,
मेहनतकश जो ऋण नहीं लेता
सोच सोच पछताता है,
खरबूजा क्यों रंग ना बदले
प्रभावित है उस्तादी से ॥ कैसे …..
कोई मुफ्त का राशन पाकर खुश
कोई मेहनत करके भी नाखुश,
मूल्य नहीं मिलता मेहनत का
कोईअन्न उगाकर भी नाखुश ,
जग का पेट भरे भूखा,
जिए मेहनत और शाबाशी से ॥ कैसे ….
महंत ,मौलवी, नेता ,बाबू
सारे के सारे परजीवी ‘ ,
चूस रहे हैं रक्त उसी का
बने हुए हैं शेख हबीबी,
मय में डूबे रहते हैं
और चोंच लड़ाते साकी से ॥ कैसे ……
सरकार अगर चाहे तो
सब संभव है दावे से,
आधी थी ,दुगनी कर दी
आय शोर-शराबे से ,
देख करोड़ों जीरो खाते
कवि नर्वस हो गए बागी से ॥ कैसे …..
सबको मेहनत ,काम मिले
उसका अच्छा दाम मिले,
अच्छा पहने ,अच्छा खाए
मेहनतकश को आराम मिले,
किए कर्म का फल मिल जाए
जिये वह भी ठाठ नवाबी से ॥ कैसे …
हाथ पैरखुद काट रहा है
निश्चिंत हुआ ‘ बैसाखी ‘ से ॥

Leave a Reply

Join Us on WhatsApp